शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७२ ] [ श्रीशारदा तिलक इन्द्र आदि ओर उनके अस्त्रों का पूर्व की तरह से समर्चन करे । उस प्रकार से भक्तों पर दया करने वाले भास्कर देव का विधि के साथ पूजन करके प्रतिदिन अर्घ्यदेवे अथवा उनके प्रेरित वार (दिन) में देवे । प्रभात से मण्डल की रचना करके पूर्व की तरह ही पीठ का अर्चन करना चाहिये ।४८-४६। ताम्रगण प्रस्थ से जल का ग्रहण करने वाले- मनोहर पात्र को वहाँ पर रखकर उसे मन्त्र द्वारा शुभ जल से भर देवे ।५०। कुंकुमं रोचना राजी रक्तचन्दनवैणवान् । करवीरजपांशालिकुशश्यामाकतण्डुलान् ।५१। निक्षिपेत्सलिले तस्मिन्नेकग्रं सञ्चिन्त्य भानुना । सांगमभ्यर्चयेत्तस्मिन् भास्करं प्रोक्तलक्षणम् ।५२ गन्धपुष्पादिनैद्यैर्यथाविधि विधानवित् । तत्पिधाय जपेन्मन्त्रं सम्यगष्टोत्तर शतम् ।५३ पुनः संपूज्य गन्धाद्यैर्जानुभ्यामवनि गतः । आमस्तकं तदुद्धृत्य व्योम्नि सावरणं रवौ ।५४ दृष्टि निधाय स्वैक्येन मूलमन्त्रं धिया जपन् । दद्यादर्थं दिनेशाय प्रसन्नेनान्तरात्मना ।५५ कृत्वा पुष्पाञ्जलि भूयोजपेदष्टोत्तरं शतम् । यावदर्घ्यामृतं भानुः समादत्ते निजैः करैः ।५६ उनमें कुंकुम, रोचना, राजी, रक्त, चन्दन, वैष्णव, करवीर, जपा, शाली, कुश, श्यामा तण्डुलों का निक्षेप कर देवे । उस जल में भानु के साथ एकता का चिन्तन करना चाहिये । उसमें कहे हुये लक्षणों वाले भास्कर का अङ्गों के सहित अर्चन करना चाहिये ।५१-५२। विधान का ज्ञाता तथा गन्ध-पुष्प और नैवेद्य आदि से अर्चन करे । उसको ढककर भली भाँति एक सौ आठ बार मन्त्र जप करना चाहिए ।५३। फिर गन्धादिके द्वारा पूजनकरके घुटनोंसे पृथ्वीपर स्थित होवे । मस्तक तक उसका उद्धार करके व्योम में सावरण दृष्टि रखकर