शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश पटल ] [ २६३ वक्षःस्थल में शोभित श्रीवत्स के चिन्ह वाले विश्वम्भर का भजन करता हूँ । २२। विकारलक्षं प्रजपेन्मनुमेनं समाहितः । तद्दशांशं सरसिजैर्जुहुयान्मधुरप्लुतैः ।२३ पीठे सम्पूजयेद्देवं विमलादिसमन्विते । विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा ततः परम् ।२४ प्रह्वी सत्या तथेशानाऽनुग्रहा नवमी तथा । नमो भगवते ब्रूयाद्विष्णवे च पदं वदेत् ।२५ सर्वभूतात्मने वासुदेवायति वदेत्ततः । सर्वात्मसंयोगपदाद्योगपद्मपदं पुनः ।२६ पीठात्मने हृदन्तोऽयं मन्त्रस्तारादिरीरितः । दत्वानेनासनं मन्त्री मूत्तिं मूलेन कल्पयेत् ।२७ इस मन्त्र का सोलह लाख जप करे और परम सावधान रह कर ही जप करना चाहिए । जप का दशांश मधुरों में प्लुत कमलों से होम करना चाहिये । नौ शक्तियों के नामों का परिगणन किया जाता है— विमला-उत्कर्षिणी-ज्ञाना-क्रिया-योगा-प्रह्वी-सत्या-ईशाना कनुग्रहा नवमी है। सर्व प्रथम 'नमो भगवते'-यह कहे । इसके पीछे 'विष्णवे- यह पद कहना चाहिये । इसके अनन्तर 'सर्व भूतात्मने वासु देवाय'- यह कहे । सर्वात्म संयोग पद से पीछे 'योग पद्म पद' कहे । 'पीठात्मने' कहे। यह हृत् अन्त वाला प्रणव के आदि वाला मन्त्र कहा गया है। मन्त्रधारी इस मन्त्र से आसन अर्पित करके मूलमन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करे ।२४-२७। आवाह्य पूजयेद्देवं सुगन्धिकुसुमादिभिः । अङ्गान्यभ्यर्च्य मन्त्राणांकेसरेषु समर्चयेत् ।२८ दलेषु वासुदेवाद्या मूर्त्तीः शक्तिसमन्विताः । वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धञ्च ।२६