शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश पटल ] [ २६७ दूसरी वासुदेव आदि के द्वारा करे । शक्ति आदिके सहित द्वादश मूर्तियों से तीसरी आवृत्ति होती है । सुरनाथादि के द्वारा चौथी और वज्रादि द्वारा पाँचवीं आवृत्ति की जाती हैं ।४५। इस तरह से पूजित किया गया अपना अभीष्ट प्रदान कर दिया करते हैं ।४६। पायसेन घृताक्तेन मन्त्रवर्णसहस्रकम् । जुहुयान्मनसः शुद्धयै समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् ४७ तत्संख्यया यथोक्ताभिः सर्वपापविमुक्तये । हृल्लेखाबीजयुगलं रमाबीजयुगं पुनः ।४८ लक्ष्म्यन्ते वासुदेवाय हृदन्तः प्रणवादिकः । चतुर्दशाक्षरोमन्त्रः प्रोक्तोऽयं सुरपादपः ।४६ हृदयं शक्तिबीजाभ्यां रमाभ्यां शिर ईरितम् । लक्ष्म्यै प्रोक्ता शिखा वर्म वासुदेवाय कीर्त्तितम् । नमसास्त्रं समुद्दिष्टं सर्वं तारादि कल्पयेत् ।५० घृत में अक्त पायस से मन्त्रके वर्ण जितने हैं उतने ही सहस्र आहू तियाँ देनी चाहिये । यह हवन मन की शुद्धि के लिए दूध वाले वृक्षों की समिधाओंसे करना चाहिये ।४७। सब पापों की विमुक्तिके लिये यथोक्त संख्या में होम करे । अब लक्ष्मी वासुदेव मन्त्र का उद्धार बताया जाता है-हृल्लेखा, भुवनेशी बीज रमा—श्री बीज ये दोनों के बीजों का युगल होना चाहिये । लक्ष्मी पद के अन्त में ‘वासुदेवा’ यह पद होवे अन्त में ‘नमः’-यह पद और आदि में प्रणव होना चाहिए । यह चौदह अक्षरों वाला मन्त्र कल्पवृक्ष जैसा ही कहा गया है । जैसे कल्पवृक्ष सब मनोरथों को पूर्ण करता है वैसे यह भी मनोभीप्सितों को पूर्ण किया करता है ।४८-४६। शक्ति बीजों से हृदय और रमा के बीजों से शिर कहा गया है । लक्ष्म्यै शिखा और वासुदेवाय वर्म कहा गया है । नम- स् से अस्त्र उद्दिष्ट किया है और तारादि से सबकी कल्पना करे ।५०। विद्युच्चन्द्रनिभं वपुः कमलजावैकुण्ठयोरेकतां । प्राप्तं स्नेहवशेन रत्नविलसद्भूषाभिरालङ्कृतम् ।