भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्दश पटल ] [ ३२३ अभिषिक्त होकर विप्रों को देवता की बुद्धि से पूजा करनी चाहिये । ३७। इसके पीछे वंचना न करते हुए भक्ति की भावना से यथा रीति से गुरुदेव का अर्चन करे । इस विधि से राजा, युद्धों में विजय को प्राप्त किया करता है । ३८। वीजाङ्क गणपञ्चकं प्रविलिखेच्छेषस्य भोगे पुनः द्वात्रिंशत्पदसंयुते परिलिखेन्मन्त्राक्षराणि क्रमात् । पुच्छेनाम जपादिसाधितमिदं होमेन सम्पातितम् । भूतापस्मृतिदुःखरोगशमनं मन्त्रं रिपुध्वसनम् । ३६ क्षकारी वह्निमारूढो मनुस्वरसमन्वि : । बिन्दुनादलसन्नूर्द्धा बीजं नरहरेर्मतम् । ४० बीजं नमोभगवते नरसिंहाय तत्परम् । स्याज्जवालामालिने पश्चाद्दीप्तदंष्ट्रीय तत्परम् । ४१ अग्निनेत्राय सर्वादि दक्षोधनाय पदं वदेत् । सर्वभूतविनाशान्तं नकारो दीर्घवान् मेरुत् । ४२ सर्वज्वरविनाशान्ते नायाणौर्दहयुग्मकम् । पचद्वयं रक्षयुग्मं हुं फट् स्वाहा ध्रुवादिकाः । ४३ सप्तषष्ट्यक्षरैः प्रोक्तो ज्वालामाली महामुनिः । हृत्तयोदशिभिः प्रोक्तं शिरोदशभिरीरितम् । ४४ शिखैकादशभिः प्रोक्ता वर्माष्टादशभिर्मतम् । वर्णैर्द्वादशभिर्न्नैत्रमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः । ४५ फिर शेष के भोग में बीजों के गण पंचक को लिखे और क्रम से बत्तीस पद संयुक्त में मन्त्र के अक्षरोंको लिखना चाहिए । पुच्छ में नाम लिखे । इसको जपादि से साधित करे और होम से सम्पादित करे । यह मन्त्र भूत, अपस्मृति, दुःख, रोग का शमन करने वाला तथा शत्रुओं के ध्वंस करने वाला होता है । ३६। क्षकार वह्नि (रेफ) से संयुत होवे और मन्त्र के स्वरों से समन्वित होवे और विन्दु तथा नादसे उल्लसित मूर्द्धा वाला नृसिंह का बीज माना गया है । ४०। अब ज्वाला