शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश पटल ] [ ३३ पीत-रक्त-सित और श्याम हैं। फिर इन्द्रादि का तथा उसके बाहर उनके आयुधों का पूजन करे। रीति से अर्चन करने पर मन्त्र सिद्ध हो जाता है और सिद्ध हो जाने पर कहे हुए प्रयोगों को करने के योग्य हो जाता है ।८३। आत्मनो वा परार्थं वा दृष्टादृष्टफलप्रदान् । दूर्वाहोमो विधातव्यो दीर्घमायुरभीप्सता ।८४ श्रीकामो जुहुयात्पद्मैः फुल्लै राज्यपरिप्लुतैः । मेधाकामे । होतव्यं प्रसूनै र्ब्रह्मवृक्षजैः ।८५ दिनत्रयं यो जुहोति गुलिकाः पुरुनिर्मिताः । अष्टोत्तरसपस्रेण स जियेन्निखिलापदः ।८६ राव्येनाज्येन गोसिद्धयै जुहुयाद्दिवसत्रयम् । उदुम्बरसमिद्धोमः पुत्रदायी भवेन्नृणाम् ।८७ प्रलयाग्निसमं चक्रं यस्य मूर्द्धनि चिन्तयेत् । सप्ताहाज्ज्वरमूर्च्छार्ती मण्डलान्मृतिमेति सः ।८८ अपने लिये अथवा दूसरों के लिए इन दृष्ट तथा अदृष्ट फलके प्रदान करने वाले प्रयोगों को करना चाहिए। दीर्घ आयुकी इच्छा रखने वाले व्यक्ति को दूर्वा का होम करना चाहिए ।८४। जो श्रीकी कामना वाला हो उसे विकसित तथा आज्य में परिप्लुत पद्मों के द्वारा हवन करना चाहिए। जो मेधा की कामना रखने वाला हो उसे ब्रह्म वृक्ष के पुष्पों के द्वारा होम करना चाहिए ।८५। जो पुरुष तीन दिन तक पुरुनिर्मित गुलिकाओं का हनन किया करता है और एक सहस्र आठवार आहुतियाँ देता है वह समस्त आपदाओं पर विजय प्राप्तकर लिया करता है ।८६। गो सिद्धि के लिये गाय घृत से तीन दिन तक होम करे । गूलर की समिधाओं से किया हुआ होम मानवों कों पुत्र के प्रदान करने वाला हुआ करता है ।८७। प्रलय काल की अग्नि के समान चक्र का जिसके मस्तक में चिन्तन करे वह एक सप्ताह में ज्वर की मूर्च्छा से पीड़ित हो जाता है और मण्डल से वह मृत्यु को प्राप्त हो जाया करता है ।८८।