शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ ] [ श्रीशारदा तिलक इस का शिर होता है । मर्दय का जोड़ा उग्रकी शिखा है । प्रध्वसद्- इसका युगल इसका वर्म होता है ।६३। रक्ष का युगल अस्त्रा है । ये सब हुम अन्त वाले कहे गये हैं । अर्थात् इन सबको अन्त में हुम यह होता है । मूर्धा, दोनों नेत्र, कण्ठ, हृदय, उदर, ऊरु, जंघा पद द्वन्द्व में मन्त्र के वर्णों का विन्यास करना चाहिए । ब्रह्मण इसका मुख है---इस मन्त्र का मुख में न्यास करे ।६५। बाहूराजन्यः कृत--- इसका दोनों बाहुओं में न्यास करे । 'ऊरू तदस्य यद् वैश्यः'--इसका ऊरू हृदय में न्यास करना चाहिए । 'पद्भ्याशूद्रो अजायत्--इसका दोनों पादों में विन्यास करे । हस्तौ के अग्र भागों में शंख, चक्र, गदा और पद्म का न्यास करना चाहिए ।६६।६७। इत्थं न्यासं तनौ कृत्वा देवं पूर्वोक्तमण्डपे । रक्तपद्मासनस्थस्य गरुडस्योपरि स्थितम् ।६८ काञ्चनाद्रिसमप्रभ कमलाननं कमलेक्षणम् । चक्रशंखगदासरोजधरं मनोहरदर्शनम् ।६६ कौस्तुभाङ्कितवक्षसं मुकुटाङ्गदादिविभूषणम् । तार्क्ष्यवाहनमच्युतं हृदि भावयामि जगत्पतिम् ॥७० अष्टलक्षं जपेन्मन्त्री मन्त्रमेतं दशांशतः । बिल्वक्षीरद्रुमोत्थाभिः समिद्द्भिररुणाम्बुजैः ।७१ पयोन्नैः सर्पिषा हुत्वा गुरुं सन्तोषयेद्धनैः । मृत्तौ मूलेन क्लृप्तायां पूजयेद्देवमन्वहम् ।७२ अङ्गान्यादौ समाराध्य दिक्पत्रेषु समर्चयेत । श्रियं धृतिं रतिं कान्तिं लोलापङ्कजधारिणीः ।७३ पीतारुणाः श्यामनीला विदिक्पत्रेषु पूजयेत् । वासुदेवादिका मूर्तीः पार्श्वयोर्निधियुग्मकम् ।७४ इस प्रकार से शरीर में न्यास करके पूर्व में कहे हुए मण्डप में देव का जो रक्त पद्म के आसन पर स्थित है---गरुड़के ऊपर विराजमान हैं सुवर्ण के पर्वत के समान प्रभा से संयुत---कमल जैसा जिनका मुख