शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचदश पटल ] [ ३६५ ये रति प्रिय है । विशिष्ठ बुद्धि वाले को चाहिये कि इन आठों का आठों दिशाओं में यजन करे । परभृत्, सारस, शुक, मेधा ।१३८-१३६। अपाङ्ग, भ्रूविलास, हावभाव कीर्त्तित किये गये । चतुरस्र के कोणों में उनके परिचारक पूजने चाहिए ।१४०। माधवी, मालती, हरिणाक्षी -मदोत्कटा-ये सित चमरों के धारण करने वाली तथा सब आभरणों से विभूषित हैं ।१५१। बाहर में लोकेश्वरों का तथा क्रम से उनके अस्त्रों का अर्चन करना चाहिये ।१४२। इस प्रकार से सुगन्धित कुसुम आदि से जो देव का भजन किया करता है वह सौभाग्य के प्राप्त करने वाला और लक्ष्मी से धनेश्वर को जीतने वाला हो जाया करता है ।१४३। जो पुरुष अशोक के पुष्पों की दधि से अक्त करके दिनदिन तक एक सहस्र आठ बार होम किया करता है वह समस्त जगतों का प्रिय होता है ।१४४। गौ के घृत से मन्त्र के द्वारा एक सौ आठ आहु- तियाँ दिया करता है अर्चि हैं हव्य वाहन में साधकेन्द्र को चाहिए सम्पात करे । उस सम्पात के घृत से वनिता अपने पति को भोजन करावे । उसके द्वारा जो-जो आदिष्ट होवे वह उस-उसको ही करे ।१४५-१४६। जो कन्याओं का अर्थी हो वह मण्डल के अन्दर में ही दध्यक्त लाजाओं के होम से प्राप्त कर लेता है और कन्या भी अपना सत्पति प्राप्त कर लिया करती है ।१४७। कामोल्लासितसाध्यमङ्गविलसतषट् कोणमेतद्बहि- र्गायत्रीगुणवर्णवद्धसुदल मालामनेारक्षरैः । षट्संख्यैः सहित्राष्टपत्रसहितं क्षोणीपुरेणावृतम् । कोणन्यस्तमनोभावेन कथितं यन्त्रं जगन्मोहनम् ।१४८ कामदेवाय शब्दान्तं विद्महे ङेऽन्तमीरयेत् । पुष्पवाणं धीमहिस्यात्तन्तोऽनङ्ग प्रचोदयात् ।१४६ नमोऽन्तकामदेवाय वदेत् सर्वजन ततः । प्रियास् सर्ववर्णान्ते जनसम्मोहनाय च ।१५०