शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७८ ] [ श्रीशारदा तिलक का अभ्यर्चन करे । श्याम--रक्त उत्पल को कर में लिये हुये--उस कर को वामाङ्ग में न्यस्त करने वाले--तीन नेत्रों से युक्त तथा रक्त वर्णं के वस्त्रों से आवृत उमापति का अर्चन करना चाहिए । वहाँ पर ब्रह्माणी आदि आठ माताओं का पूजन करे जिनके लक्षण बताये जा चुके हैं ।४७-४६। इन्द्रादिकांल्लोकपालान् स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् । वज्रादीनि तदस्त्राणि तद्बहिः क्रमशोऽर्चयेत् ।५० एव योभजते मन्त्री देवेश तमुमापतिम् । स भवेत्सर्वलोकानां प्रियः सौभाग्यसम्पदाम् ।५१ सान्तःसद्यान्तसंयु क्तो बिन्दुभूषितमस्तकः । षड्दीर्घयुक्तवीजेन षडङ्गविधिरीरितः । वामदेवो मुनिश्चन्दः पँक्तिदेवः सदाशिवः ।५३ ईशानादीर्घ्यं सेन्मूर्त्तिरङ्गुष्ठादिषु देशिकः । ईशानाख्यं तत्पुरुषमघोर तदनन्तरम् ।५४ वामदेवाह्वायं सद्यमासां वीजं क्रमाद्विदुः । ओकाराद्यैः पञ्चह्रस्वैर्विलोमात्संयु त वियत् ।५५ तत्तदङ्ग॰ लिभिर्भू यस्तत्तद्वीजादिकान्यसेत् । शिरोवदनहृद्गुह्यपादशेषे यथाक्रमम् ।५६ ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु ताः । ततः प्रविन्धसेद्विद्वानष्टत्रिंशत्कलास्तनौ ।५७ इन्द्र देव आदि लोकपालों का अपनी-अपनी दिशाओं में समर्चन करे । वज्र आदि जो उनके आयुध हैं उनके बाहर उनका क्रम से पूजन करना चाहिए । जो मन्त्र के धारण करने वाला पुरुष इस प्रकार से देवेश्वर उमापति का सेवन किया करता है वह पुरुष सब लोकों का प्रिय और सौभाग्य--सम्पदाओं का स्थान हों जाया करता है ।५१। अब प्रसाद मन्त्र को उद्धार के सहित बताया जाता है--सान्त--हः,