शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ ] [ श्रीशारदा तिलक माया, ये रुद्र देव के पीठ और अंक स्थित है। इनका शरीर सिन्दूर के समान अरुण है। इसके करकमलों में रक्तकमल और कपाल का परम शोभा रहती है ।४१-४४। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन ।४५। श्रीधरश्च हृषीकेशः पद्मनाभस्ततः परम् । दामोदरोवासुदेवः सङ्कर्षण इतीरिताः ।४६ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च स्वराणां मूर्त्तयस्त्विमाः । पश्चाच्चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी शंखी हली पुनः ।४७ मुसली शूलिसंज्ञोऽन्यः पाशी स्यादांकुशी पुनः । मुकुन्दो नन्दजो नन्दी नरो नरकजिद्धरिः ।४८ कृष्णः सद्यः सात्वतः (सात्विकः स्यात् शौरिः शूरो जनार्दनः भूधरो विश्वमूर्त्तिश्च वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः ।४६ बली बलानुजो बालो वृषघ्नश्च वृषः पुनः । हिंसो (हंसो) वराहो विमलो नृसिंहो मूर्त्तयो हलाम् ।५० श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, ये स्वरों की मूर्तियाँ होती है। चक्री, गदी अर्थात् गदाधारी, शार्ङ्गी, खङ्गी, शंखी, हली अर्थात् हल के धारण करने वाले, मुशली, शूली, पाशी, अंकुशी, मुकुन्द, नन्दल, नन्दी, नर, नरक- जित्, हरि, कृष्ण, सावन्त, शौरि, शूर, जनार्दन, भूधर, विश्व, मूर्ति, बैकुण्ठ, पुरषोत्तम-वली, बलानुज,वाल, वृषघ्न, वृष, हंस, वराह, विमल और नृसिंह ये हलों अर्थात् व्यंजनों की मूर्तियाँ होती है ।४६-५०। केशवाद्या इमे श्यामाश्चक्रशंखलसत्कराः । कीर्तिः कान्तिस्तुष्टिपुष्टी धृतिःक्षान्तिः क्रियाः दया ।५१ मेधा सहर्पा श्रद्धा स्याल्लजा लक्ष्मीः सरस्वती। प्रीती रतिरिमाः प्रोक्ताः क्रमेण स्वरशक्तयः ।५२