शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६० ] [ श्रीशारदा तिलक मन्त्र बतलाते हैं—अष्ट दलों वाली कर्णिका के मध्य में उन-उन बीजों से संयुत विदर्भित नाम लिखना चाहिये । वश्य प्रयोग में पाश बीज, शांति प्रयोग में वरुण बीज, उच्चाटन में क्रोधाग्नि बीज लिखे । मध्य में पिणु और नीचे दलादिल में पश्चिम में—उत्तर दिशा में दक्षिण दिशा में और पूर्व दिशा में गरुड़ मन्त्र के मध्य में कर्णिकान्तर अन्त्य अक्षर लिखे अर्थात् चवर्णों को लिखना चाहिए । बाहर वदि अर्थात् परवल आदि को लिख । पश्चिम उत्तर तथा पूर्व दिशाओं में बाहिर अर्णों को वेष्टित करे । दक्षिण नाम विलोचन अर्थात् दीर्घ इकार से संयुत क-आद्यों से कल्पित पिण्ड नामक परम यन्त्र होता है । यहाँ पर पिण्डान्या देवता है ॥५१॥ मनुस्वरॆन्दुजेशोग्निंसंयुतश्चपुराननः । पिण्डवीजमिदं प्रोक्त पुंसां सर्वार्थसाधकम् ।५२ बीजेनानेन सञ्जप्तं मन्त्रं रक्षाकरं परम् । आयुरारोग्यजननं लक्ष्मीसौभाग्यवश्यदम् ।५३ चौरसर्पमृगव्यालभूतामयंनिकृन्तनम् । गर्भरक्षाकर स्त्रीणां पुत्रदं क्षुद्रनाशनम् ॥ धृतं मूर्ध्नि करोत्येतल्लोकवश्यमणत्तमम् ।५४ मध्ये तोयगृहे लकारविवरे साण्णाढ्यसाध्यं । पत्रेष्वष्टसु हंसमन्त्रमभितोह्मार्णसंवेष्टितम् । यन्त्रं भूमिगृहेण वेष्टितमिदं मूर्द्धना सदा धारितम् । हन्यात् क्षुद्रमहाज्वरामयरिपून् दद्यात् यशः सम्पदः ।५५ ईकारमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तमष्टपत्रेषु पुनर्विलिख्य । संवेष्टयेत् तेन धरापुरस्थं यन्त्रं भवेद्वश्यकं नराणाम् ।५६ ताम्रपात्रे समालिख्य यन्त्रमेतत्प्रपूजयेत् । वशयेत्सकलान्मर्त्यान्नात्र कार्या विचारणा ।५७