भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 462

४६२ । [ श्रीशारदातिलक दूर करने वाला बताते हैं-आठ दलों वाली कर्णिका में साध्य और साधक के नामों के वर्णों से वेष्टित लकार स्थमकार लिखे । टकार लान्तान्वित लिखें और आठ दलोंमें पुनः लिखना चाहिए । इसको भूमि के अन्दर विवर में गाड़ देवे तो बहुत उत्तम सञ्जीवन नाम वाला मन्त्र होता है । यह शस्त्रों से होने वाले भय को भुजा में धारण करने पर दूर भगा दिया करता है ।५८। अब ज्वर का हनन करने वाला मन्त्र बताया जाता है—टान्‍त में वकार से आवृत्त और वाह्य में लान्तावृत्त को तथा आठों दलों में हंस को लिखे । वाह्य में अम्बु गृह से आवेष्टित करे तो लान्तावृत्त यह मन्त्र ज्वर को नाश करने वाला होता है ।५६। टान्ते नाम लिखेत्क्षकारविवरे मृत्युञ्जयत्र्यक्षरी रुद्धं तद्बहि ष्टपत्रविवरे साध्याह्वयं पूर्ववत् । अचूकिन्सलकयुते वसुद्वयदले पद्मे तथैवाह्वयम् । द्वात्रिंशद्दलपङ्कजेऽपि च तथा काहणप्रुक्केसरे ।६० ईकारेण समावीतं यन्त्रं मृत्युञ्जयाह्वयम् । सर्वरोगाभिचारघ्नं सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् ।६१ ग्लौं रुद्धं प्रणवद्वयं परिलिखेत्साध्यस्य नामान्वितम् । बाह्ये भूपुरमष्टवज्रविलसत्तार लिखिन्वापुनः । क्षं कोणेषु दिशासु लं प्रविलिखेत् पाशांकुशन्त्यपरी वीतं स्तम्भनयन्त्रमावृतिलसज्जृम्भादिविद्याष्टकम् ।६२ जम्भे वह्निवधूः पूर्वं पश्चाज्जृम्भिनि ठद्वयम् । मोहे पावकजाया स्यात्ततो मोहिनि ठद्वयम् ।६३ अन्धे हुतभुजी जाया ततोऽन्धिनि ठयुग्मकम् । रुन्धे कृशानुपत्नी स्यात् रुन्धिनि द्वित्ठसयुतम् ।६४ अब रोगों के अभिचार के हनन करने वाला मन्त्र लिखा जाता है--टान्‍त में अर्थात् क्षकार विवर में मृत्युञ्जय तीन अक्षरों वाले मन्त्र से रुद्ध नाम लिखना चाहिये । पूर्व की ही भाँति मृत्युञ्जय मन्त्र से सम्पुटित नाम का लेखन करे । षोडश दलों में पूर्व की भांति नाम