भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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विंश पटल ] [ ४८१ आधारादुद्गतो वायुर्यथावत्सर्वदेहिनाम् । देहं व्याप्य स्वनाडोभिः प्रयाणं कुरुते बहिः । ३८ वहाँ पर मतों के भेद से अनेक प्रकार के आधार कहे जाते हैं। अमृतानन्द के कारण इसको दिव्य माना जाता है । ३३। इडा में चन्द्र संचरण किया करता है और पिङ्गला में दिवाकर का संचरण होता है। जो योग के निदान के ज्ञाता हैं वे सुषुम्ना में इन दोनों का संचरण जानते हैं । ३४। आधार कन्द के मध्य में स्थित अत्यन्त सुन्दर त्रिकोण है। आगमवेत्ता इसकी ज्योतियों का दिव्य निलय कहते हैं । ३५। वहाँ पर विद्युल्लता के आकार वाली परम देवता कुण्डली है। सबकी आत्मा यह सोते हुये सर्प की-सी आकृति वाली परिस्फुरण किया करती है । ३६। आत्मा हंस के आश्रय में रहने वाली यह कुण्डली शक्ति का विभरण करता है। प्राणों के आश्रम वाला हंस नित्य ही नाड़ियों के समन्वय से युक्त प्राण है । ३७। समस्त देहधारियों के आधार से उद्भूत वायु यथावत् अपनी नाड़ियों के द्वारा देह में व्याप्त होकर बाहर प्रयाण करता है । ३८। द्वादशांगुलमानेन तस्मात्प्राण इतीरितः । रम्ये मृद्वासने शुद्धे पटाजिनकुशोत्तरे । ३६ बध्वैकमासनं योगी योगमार्गपरो भवेत् । ज्ञात्वा भूतोदयं देहे विधिवत्प्राणवायुना । ४० तत्तद्भूतं जपेद्देहं दृढत्वावाप्तये सुधीः । दण्डाकारा गतिर्भूमेः पुठयोरुभयोरधः ।४१ तोयस्य पावकस्योर्ध्वगतिस्तिर्यङ्नभस्वतः । गतिर्व्योम्नो भवेन्मध्ये भूतानामुदयः स्मृतः ।४२