भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 511 में से

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विश पटल ] [ ४८३ अङ्गुलियों से, दोनों नेत्रों को मध्यमाओं से, नासिका के दोनों छिद्रों को तथा अन्य अङ्गुलियों से मुख को दृढ़ता से वद्ध करके आत्मा-प्राण और मन के एकत्व का स्मरण करते हुये वायु को भली-भाँति धारण करे—यह योग योगियों का परम प्रिय होता है। क्रम से शनैः अभ्यास करने वाले के नाद समुत्पन्न हुआ करता है ।४५-४७। मत्तभृङ्गाङ्गनागीतसदृशः प्रथमोध्वनिः । वंशिकास्याविलापूर्णवंशध्वनिनिभाऽपरः ।४८ घण्टारवसमः पश्चाद् घनमेघस्वनोऽपरः । एवमम्यसतः पुंसः संसारध्वान्तनाशनम् ।४६ ज्ञानमुत्पद्यते पूर्वं हंसलक्षणमव्ययम् । पुम्प्रकृत्यात्मको प्र.क्तौ बिन्दुसर्गौ मनीषिभिः । ५० ताभ्यां क्रमात्समुद्भूतौ बिन्दुसर्गोवसानकौ । हंसौ तौ पुम्प्रकृत्याख्यो ह पुमान्प्रकृतिस्तु सः ।५१ अजपा कथिता ताभ्यां जीवोयमुपतिष्ठति । पुरुष स्वाश्रय मत्वा प्रकृतिर्नित्यमोत्मना ।५२ यदा तद्भावप्राप्नोति तदा सोऽहमिसं भवेत् । सकारार्ण तवार्णं लोपयित्वा तत परम् ।५३ सन्धि कुर्यात्पूर्वरूपन्तदासौ प्रणवो भवेत् । परानन्दमयं नित्यंचैतवेक गुणात्मकम् । आत्माभेदस्थितं योगी प्रणव भावयेत्सदा ।५४ आम्नायवाचामतिदूरमाद्यं वेद्यं स्वसंवेद्यगुणेन सन्तः । आत्मानमानन्दरसैकसिन्धुं पश्यन्ति तारात्मकमत्मनिष्ठाः५५

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