शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंश पटल ] [ ४६५ मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै- र्यक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुट तत्त्वात्मवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशाः शूलं कपाल गुणं शंखचक्रमथारविन्दगलं हस्तेवहन्ती भजे ॥१६ प्राणायामान्पुरा कृत्वा गायत्री सन्ध्योर्जपेत् । सप्तव्याहृतिसंयुक्तां गायत्री शिरसान्विताम् ॥१७ तिरुच्चरन्धिया प्राणान्धारयेद्यतमानसः । प्राणायामोऽयमाख्यातः समस्तदुरितापहः ॥१८ व्याहृतित्रयसंयुक्ता गायत्री दीक्षितो जपेत् । तत्त्वलक्षं विधानेन भिक्षाशी विजितेन्द्रियः ।१६ क्षीरौदनंतिलांन्दूर्वाक्षोरद्रुमसमद्भिदरान् । पृथक् सहस्रत्रितयं जुहुयान्मन्त्रसिद्धये ।२० विधाय मण्डलं विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिकाम् । सौरं पीठं यजेत्तत्र दीप्तादिनवशक्तभिः ।६१ नेत्र सदाशिव भगवान् के लिए बताया गया है तथा अस्त्र सर्वात्मा के लिए कहा है । इसी प्रकार से छं अङ्गों को कहा गया है, अतएव छै अङ्गों को ठीक स्थान पर ही विन्यस्त करना चाहिए ।१५। अब ध्यान बताया जाता है—मुक्ता (मोती), विद्रुम हेम, नील और धवल छाया वाले मुखों और तीन नेत्रों से समन्वित, चन्द्र जिसमें निबद्ध है ऐसे रत्नों के निर्मित मुकुट (शिरोभूषण) से युक्त, तत्त्व स्वरूप वर्णों के आत्मा वाली करों में वरदान, अभयदान, अंकुश, कशा, शूल, कपाल गुण, शंख चक्र और छै अरविन्दो को धारण करने वाली गायत्री देवी का मैं भजन करता हूँ ।१६। सबसे पूर्व प्राणायामों को