शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ
पृष्ठ 58, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 58
५४ ] श्री शारदा तिलक पश्चिम दिशा में और महीधर का उत्तर दिशा में पूजन करे । कोणार्ध दो कोष्ठों में वह्नि आदिका पूजन करना चाहिए ।८-६। ऊर्ध्व कोष्ठमें सावित्र का और अधः कोष्ठ में सविता का यजन करे । फिर विद्वान- पुरुष शक्र, इन्द्र जय, रुद्र-रुद्र जय पाँच अववतसक का पूजन करे ।१०। उस कोण सूत्र के दोनों ओर कोष्ठ द्वन्द्वों में आचार्य क्रम से शर्व-गुह
- अर्यमा-जम्भक पिलि पिच्छक-तरक्षी-विहारी और पूतना का जमर्चन करे । पूर्वादि सार्ध आद्यन्त पदों में दिशाओं में इनका पूजन करना चाहिए ।११-१२। उत्तम आचार्य काम में आठ-आठ के विभाग से देवों का यजन करे । ईशान-मर्जन्य - अत्यन्त-शक्र-भास्कर - सत्य-वृष-अन्तरिक्ष जो प्राची दिशा में अवस्थित है । अग्नि - पूषा-वितथ-यम-गृह रक्षक-गन्धर्व-भृङ्गराज-मृग जो कि दक्षिण दिशा में अवस्थित है । निर्ऋति-दौवारिक-सुग्रीव-वरुण-पुष्पदन्त- असुर- शेष-रोग-जो प्रत्यग् दिशा में अवस्थित है । वायु-नाग-मुख्य- सोम-भल्लाट-दिति-अदिति जो कि कुवेर की दिशा में स्थित हैं । इन उक्त देवों के भी पदों को पाँचों से आपूरित करे ।१३-१७। रजोभिस्तेष्वथैतेभ्यः पायसान्नैर्बलिं हरेत् । अयं वास्तुबलिः प्रोक्तः सर्वसम्पत्समृद्धिदः । १८ नक्षत्रराशिवारणामनुकूले शुभेऽहनि । ततो भूमितले शुद्धे तुषाङ्गारविवर्जिते ।१६ पुण्याहं वाचयित्वा तु मण्डपं रचयेच्छुभम् । पञ्चभिः सप्तभिर्हस्तैर्नवभिर्वामितान्तरम् ।२० षोडशस्तम्भसंयुक्तं चत्वारस्तेषु मध्यगाः । अष्टहस्तसमुच्छायाः संस्थाप्या द्वादशाऽभितः ।२१ पञ्चहस्तप्रमाणास्ते निश्छिद्रा ऋजवः शुभाः । तत्पञ्चमांशं संन्यस्ये-(न्निखने) न्मेदिन्यां तन्त्रवित्तमः ।२२