भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 511 में से

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६० ] [ श्रीशारदा तिलक सूत्रयुग्मं ततो दद्यात्कुण्डं योनिनिभं भवेत् । चतुरस्रीकृत क्षेत्रं दशधा विभजेत्पुनः ।५५ उन कुण्डों के चतुरस्रयौनि, अर्धचन्द्र, त्र्यस्र, सुवर्त्तल- षडस्र-पक- जाकर और अष्टस्र ये नाम होते हैं ।४६। गौरी और महेन्द्र का आचार्य्य कुन्ड मध्य में होता है। एक हाथ के मान से परिमित भूमिकी पूर्व की ही भाँति पीरकल्पना करनी चाहिए ।५०। यह कुन्ड चारों ओर से चतुरस्र शुभ का आवाहन करने वाला होता है । इसको मन्त्रके वेत्ता जन चौवीस अंगुलों से आढ्य ( एक हाथ ) कहा करते हैं ।५१। कर्त्ता के दाहिने हाथ के मध्यमांगुलिके पर्व वाले मध्यके दीर्घ भाव से अंगुलि का मान कहा गया है ।५२। आठपर्वोंका कॢप्त अंगुलिका माम बताया गया है । सुधी पुरुष चतुरस्र कृत क्षेत्र का पाँच प्रकार से विभाजन करे ।५३। आगे कोण के अर्धार्र्ध प्रमाण से एकांश का न्यास करे । मन्त्र का ज्ञाता पुरुष को उसी भाँति कोण के मान से अन्य का भी भ्रमण करना चाहिए इसके उपरान्त सूत्रों के युग्म को देने से योनि के तुल्य कुन्ड होता है । सतुरस्री कृत-क्षेत्र को दश प्रकार से विभक्त करना चाहिए ।५४-५५। एकमेकं त्यजेदंशमधऊर्ध्वं च तन्त्रवित् । ज्यासूत्रं पातयेदग्रे तन्मानाद्भ्रमयेत्ततः ।५६ अर्द्धचन्द्रनिभं कुण्डरमणीयमिदं भवेत् । चतुर्द्धा भेदिते क्षेत्रे न्यसेदुभयपार्श्वयोः ।५७ एकैकमंशं तन्मानादग्रतो लाञ्छयेत्ततः । सूत्रयुग्मं बुधः (ततः) कुर्य्यात्त्र्यस्रकुण्डमुदाहृतम् ।५८ अष्टादशांशे क्षेत्रे च न्यसेदेकं वहिर्बुधः । भ्रमयेत्तेनमानेन वृत्तं कुण्डमनुत्तमम् ।५६ अष्टधाविभजेत्क्षेत्रं मध्यसूत्रस्यपार्श्वयोः । भागन्यसेदेकमेकं भागेनानेन मध्यतः ।६०

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