शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषय प्रवेश भारतवर्ष का प्राचीन धार्मिक साहित्य निगम और आगम दो श्रेणियों में विभाजित है। इनमें से “निगम” वेदमूलक साहित्य को कहते हैं, जिसमें उपनिषद्, स्मृतियाँ, दर्शन आदि की गणना की जाती है। इसके दो मुख्य लक्षण “विद्यास्थान” और “धर्मस्थान” कहे गये हैं- पुराण न्याय मीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रत। वेदाः स्थानानि 'विद्यानां धर्मस्य' च चतुर्दश ॥ (याज्ञवल्क्य) यह वैदिक साहित्य भावना की दृष्टि से परा और अपरा—ऐसे दो नामों से भी प्रसिद्ध हैं। “अपरा” भाग में धर्म का वर्णन लौकिक व्यवहार की दृष्टि से किया गया हैं और “परा” का उद्देश्य ब्रह्म का ज्ञान और उसकी प्राप्ति का मार्ग माना गया है। यद्यपि वेदमूलक अपरा विद्या में लौकिक अभ्युदय का ध्यान रखा गया है, पर उसका स्वरूप धर्मशास्त्रानुकूल और शिष्ट-समाज द्वारा मान्य होना आवश्यक है। इस श्रेणी के वैदिक साहित्य का मूल भारतीय मनीषियों के मतानुसार अनादि और नित्य माना गया है। आगम-शास्त्र को स्रोत शिवजी को बतलाया जाता है। इस मार्ग की अधिकांश रचनायें शिव-पार्वती के संवाद रूप में मिलती हैं। जिस प्रकार प्रत्येक पुराण, चाहे वह विषय के विवेचन तथा भाषा-शैली की दृष्टि से कितना ही बढ़िया अथवा घटिया हो, व्यासजी द्वारा रचित बतलाया गया है, उसी प्रकार आगम ग्रन्थों का कर्तृत्व शिवजी के नाम पर मान लिया गया है । इसका आशय यह समझा जा सकता है, कि चाहे विभिन्न आगम ग्रन्थ अलग-अलग काल में अनेक विद्वानों द्वारा लिखे गये हैं, पर उनका मूल आधार वही सिद्धान्त है, जिसे भगवान शिव ने सर्वप्रथम लोक हितार्थ प्रकट किया था। यद्यपि इस “शारदातिलक” को भी शिवजी के ज्ञान का ही प्रसाद माना गया है, तो भी इसके लेखक श्री लक्ष्मण देशिकेन्द्र ने रचना का उत्तरादायित्व अपना रखा है, जैसा कि ग्रन्थ के आरम्भ में ही कह दिया गया है—