भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्थ पटल ] [ ७६ हृदयादिषु विन्यस्येच्चाङ्गमन्त्रांस्ततः सुधीः हृदयाय नमः पूर्वं शिरशे वह्निवल्लभा ॥३३ शिखायै वषडित्युक्तं कवचाय हुमीरितम् । नेत्रत्रयाय वौषट् स्यादस्त्राय फडिति क्रमात् । ३४ षडङ्गमन्त्रानित्युक्तान्षडङ्गेषु नियोजयेत् । पञ्चाङ्गानि मनोर्यस्य तत्र नेत्रमनुन्यजेत् । ३५ अङ्गहीनस्य मन्त्रस्य त्वेनैवाङ्गानि कल्पयेत् । तत्तत्कल्पोक्तविधिना न्यासानन्यान्समाचरेत् । ३६ फिर मातृका न्यास करके अनन्तर में मन्त्र का न्यास करना चाहिए। सजाति अङ्गों से अंगुष्ठादि अंगुलियों में न्यास करे । ३१। उनके तलों में अस्त्र का न्यास करके तीन तालियां आदि करे। समा- हित होकर उसी के द्वारा दिशाओं का छोटिकाओं से बन्धव करना चाहिए । ३२। इसके उपरान्त सुधी पुरुष हृदय आदि से अङ्ग मन्त्रों का विन्यास करे । न्यास का क्रम यह है पहिले हृदयाय नमः-शिर से स्वाहा-शिखायै वषट् -कवचाय हुम् - नेत्रत्रयाय वौषट् और अस्त्राय फट-इसी क्रम से करे । ३३-३४। फिर छे अङ्गों में युक्त षडङ्ग- मन्त्रों को नियोजित करना चाहिए। जिस मन्त्र के पाँच अङ्ग हैं वहाँ पर नेत्र मन्त्र का यजन करे । ३५। अङ्गहीन मन्त्र के अपने ही के द्वारा अंगों की कल्पना करे। उस-उस कल्प में कही हुई विधि से अन्य न्य-सों का समाचरण करना चाहिए। ३६। कल्पयेदात्मनोदेहे पीठं धर्मादिभिः क्रमात् । अंसोरुयुग्मयोर्विद्वान्प्रादक्षिण्ये न देशिकः । २७ धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं न्यस्य त् क्रमात् । मुखापार्श्वनाभिपाष्ठोऽधर्मादींश्च प्रकल्पयेत् । ३८ धर्मादयः स्मृताः पादाः पीठगात्राणि चापरे । अनन्तं हृदये पद्ममस्मिन्सूर्येन्दुपावकान् । ३६