भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 65 चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमः स्यादाुरःक्षतात्। क्षय पाँच ही माने जाते हैं। यथा-तीनों दोषों से तीन, सन्निपात से चौथा और उरःक्षत से पाँचवाँ। वक्तव्य-क्षय का दूसरा नाम 'राजयक्ष्मा' या तपेदिक है। एक तो इस रोग में रसधातु कफ के रूप में और उरःक्षत होने पर रक्त के रूप में निकल जाता है। अतः इसे 'कफक्षयी' भी कहा जाता है और शुक्र के अधिक क्षय से (सब धातु शुक्र रूप में परिणत होकर निकल जाते हैं) उक्त दोनों ही प्रकार से धातुओं का क्षय या ह्रास होता जाता है, अतएव इसे 'क्षय' कहते हैं। शोष की कारण-भेद से गणना शोषाः स्युः षट्प्रकारेण स्त्रीप्रसङ्गाच्छुचो व्रणात् ।। २३ ।। अध्वश्रमाच्च व्यायामाद् वार्धक्यादपि जायते। शोष छः प्रकार का होता है-1. अधिक मैथुन करने से, 2. शोक से, 3. व्रण से, 4. मार्ग की थकावट से, 5. अधिक व्यायाम (कसरत) से और 6. बुढ़ापा से। वक्तव्य-स्वस्थान स्थित धातुओं का सूख जाना ही 'शोष' होता है। हमारे विचार में मैथुन एवं व्रण से होने वाले शोष को क्षय कहना उचित होगा, क्योंकि इनमें शुक्र और पूय (मवाद) के रूप में धातुओं का क्षय होता है, न कि शोष। श्वास-गणना श्वासाश्च पञ्च विज्ञेयाः क्षुद्रः स्यात्तमकस्तथा ।। २४ ।। ऊर्ध्वश्वासो महाश्वासश्छिन्नश्वासश्च पञ्चमः। 'श्वास' रोग पाँच होते हैं। यथा-1. क्षुद्र, 2. तमक, 3. ऊर्ध्वश्वास, 4. महाश्वास और 5. छिन्नश्वास। वक्तव्य-'श्वास रोग' को 'दमा' कहते हैं। श्वास लेने में कष्ट होना ही 'श्वास रोग' है। हिक्का-गणना कथिताः पञ्च हिक्कास्तु तास्तु क्षुद्राऽन्नजा तथा ।। २५ ।। गम्भीरा यमला चैव महती पञ्चमी तथा। हिक्का पाँच प्रकार की होती है। यथा-1. क्षुद्रा, 2. अन्नजा, 3. गम्भीरा, 4. यमला और 5. महती। वक्तव्य-हिक्का को ही 'हिचकी' कहते हैं। जठराग्नि विकार गणना चत्वारोऽग्नेर्विकाराः स्युर्विषमो वातसम्भवः ।। २६ ।।

तीक्ष्णः पित्तात् कफान्मन्दो भस्मको वातपित्तयोः। अग्नि-विकार चार होते हैं। यथा-1. वायु से विषम, 2. पित्त से तीक्ष्ण, 3. कफ से मन्द एवं 4. वात-पित्त से 'भस्मक'। अरोचक-गणना पञ्चैवारोचका ज्ञेया वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। २७ ।। सन्निपातान्मनस्तापात् - अरोचक पाँच होते हैं। यथा-1. वायु से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से और 5. मानसिक कष्ट से। वक्तव्य-जब रोगी यह कहता है कि खाने को जी नहीं चाहता या खाना अच्छा नहीं लगता, तो इसे 'अरोचक या अरुचि' समझना चाहिये। छर्दि-गणना -छर्दयः सप्तधा मताः। त्रिभिर्दोषैः पृथक् तिस्रः कृमिभिः सन्निपाततः ।। २८ ।। घृणया च तथा स्त्रीणां गर्भाधानाच्च जायते। छर्दि सात प्रकार की होती है। यथा-तीनों दोषों से पृथक्-पृथक् तीन, कृमियों से चौथी, सन्निपात से पाँचवीं, घृणा से छठी और स्त्रियों को गर्भधान हो जाने से सातवीं। वक्तव्य-छर्दि को ही उलटी, कै, वमि या वमन कहते हैं। स्वरभेद-गणना स्वरभेदाः षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रयः ।। २९ ।। मेदसा सन्निपातेन क्षयात् षष्ठः प्रकीर्तितः। स्वरभेद छः प्रकार का होता है-1. वायु से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. मेदा के बढ़ने से, 5. सन्निपात से और 6. धातुक्षय से। वक्तव्य-गला बैठना या बोला न जाना ही 'स्वर भेद' कहा जाता है। तृष्णा-गणना तृष्णा च षड्विधा प्रोक्ता वातात् पित्तात् कफादपि ।। ३० ।। त्रिदोषैरुपसर्गेण क्षयाद् धातोश्च षष्ठिका। तृष्णा छः प्रकार की कही गयी है। यथा-1. वायु से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. उपसर्ग से और 6. धातुक्षय से।