शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(viii) का अनुकरण मात्र नहीं है, अपितु 'दीपिका' शब्द की विपुलार्थ वाचकता एवं आयुर्वेदीय चिकित्सा क्षेत्र में उसकी सदाशयता ने हमें इसी नाम को रखने के लिए बाध्य किया, क्योंकि यह टीका 'छात्रबुद्धि-दीपिका' तथा अपने सत्प्रयोग से 'जठराग्नि-दीपिका' भी है। यहाँ तक 'दीपिका' नाम की सार्थकता का विवरण दिया गया है। अब हम इसके आगे टीका-सम्बन्धी विशेषताओं की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत करेंगे। आयुर्वेदीय ग्रन्थों की टीका करते समय इस बात का विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, कि पद्यों द्वारा जितना विषय कहा गया है। क्या वह प्रायोगिक दृष्टि से पर्याप्त है? अथवा उसे और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता है? इस टीका में इन दृष्टियों से पूरा-पूरा ध्यान दिया गया है। आप किसी भी योग का निर्माण इसमें दी गयी टीका तथा वक्तव्यों की सहायता से सरलतापूर्वक कर सकते हैं। इसके बाद आपको कुछ भी सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। योगों के निर्माण में कहाँ किस प्रकार की अड़चनें आती हैं, कैसे उनका निराकरण किया जाता है, किस प्रकार की सावधानियाँ रखनी चाहिए, कौन द्रव्य किसमें अतिरिक्त ग्राह्य है और कौन त्याज्य है, शास्त्रोक्त न होने पर भी किस योग में कौन-सा कार्य विशेष रूप से किया जाता है, परम्परागत योगों में क्या-क्या विशेष कर्तव्य होते हैं, इस प्रकार की सभी बातों पर इस टीका में विशेष ध्यान दिया गया है; यही इसका मौलिक स्वरूप है। वक्तव्य तथा विशेष वक्तव्य आदि में जो कुछ जहाँ कहा गया है, वह अपने चिरकालीन चिकित्सा एवं औषधनिर्माण-सम्बन्धी अनुभवों का सारसमुच्चय है। चिकित्सा-क्षेत्र में अति उपयोगी होने के कारण महर्षि अग्निवेश कृत 'अञ्जननिदान' को भी इस ग्रन्थ के अन्त में स्थान दिया गया है। इसके उक्त नाम की सार्थकता यह है, कि चिकित्साकाल में चिकित्सक की दृष्टि को निदान साहित्य उसी प्रकार निर्मल कर देता है जिस प्रकार रोगग्रस्त नेत्रों को अञ्जन-प्रयोग। पूर्ववर्ती ग्रन्थकारों का प्रभाव-शार्ङ्गधरसंहिता में चरक, सुश्रुत आदि संहिता ग्रन्थों के अतिरिक्त चक्रदत्त तथा सोढल का प्रभाव परिलक्षित होता है। इसमें रसशास्त्र-सम्बन्धी सामग्री समसामयिक एवं पूर्ववर्ती विभिन्न रसशास्त्रीय ग्रन्थों से ली गयी प्रतीत होती है। शार्ङ्गधर के संस्करण-आज उपलब्ध होने वाले शार्ङ्गधरसंहिता के संस्करणों में कोई भी संस्करण ऐसा नहीं है, जिसे हम 2600 श्लोकों से परिपूर्ण देख सकें। विभिन्न पुस्तकालयों में सुरक्षित इसकी पाण्डुलिपियाँ भी खण्डित ही प्राप्त हुई हैं। आज प्राप्त होने वाले प्रायः सभी संस्करणों में 2400 के लगभग श्लोक प्राप्त होते हैं। पं० परशुरामशास्त्री विद्यासागर द्वारा सम्पादित, निर्णयसागर प्रेस द्वारा प्रकाशित उक्त संहिता में सर्वाधिक श्लोक 2361 प्राप्त हैं, किन्तु इसे भी सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता। अतः मेरे हृदय में इसे पूर्ण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। प्रेरणास्रोत-किसी क्षेत्र में किसी प्रकार की भी ज्यों की त्यों क्षति-पूर्ति करना अत्यन्त दुष्कर कार्य होता है, फिर भी प्रयत्नशील एवं साहसी पुरुष इस ओर प्रवृत्त होते ही हैं। जैसे कालक्रम से खण्डित चरकसंहिता की पूर्ति आचार्य दृढ़बल ने की थी, जो आज सर्वमान्य है। इसी एक प्रकाश-किरण ने मेरे विचार-पथ को भी आलोकित किया, जिसके फलस्वरूप मैं शार्ङ्गधरसंहिता की पूर्ति करने के लिए प्रवृत्त हुआ। इस दुरूह कार्य के सम्पादन में मुझे अध्ययनकाल में अपने परमपूज्य गुरुजी के समय-समय पर प्राप्त अमूल्य उपदेश, शार्ङ्गधरसंहिता का विषयक्रम-उक्त संहिता में संगृहीत पद्यों का पूर्वापर सम्बन्ध, उन-उन मूलसंहिताओं से उद्धृत पद्यों के अवशिष्ट प्रसंगोचित विषयों का अभाव तथा ग्रन्थकार की शैली एवं उसके सिद्धान्त आदि का यथासम्भव विचार कर इसकी पूर्ति की गयी है। शार्ङ्गधर के परवर्ती भावमिश्र ने इसके अनेक पद्यों को अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। ऐसे पद्यों का हमने पुनः इसमें निःसंकोच संग्रह कर लिया है। ग्रन्थकार ने कुचिला तथा भिलावे के प्रयोग तो लिखे हैं, परन्तु उनके संशोधन प्रकार छोड़ दिये हैं, उन्हें इसमें पूरा किया गया है। 'अणुतैल' की नस्य लेने का विधान तो इसमें मिलता है, किन्तु उसके निर्माण-विधि का निर्देश न होने पर उसे भी इसमें यथास्थान व्यवस्थित कर दिया है। इस प्रकार के विभिन्न स्थलों को खोज-खोजकर इसकी श्लोक संख्या की पूर्ति की गयी है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA