शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 356 में से
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92 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे वक्तव्य- उक्त तीनों क्वाथ पित्तज्वरों का शमन करते हैं। बीजपूरादि क्वाथ बीजपूरशिफापथ्यानागरग्रन्थिकैः शृतम्।।17।। सक्षारं पाचनं श्लेष्मज्वरे द्वादशवासरे। बिजौरा नींबू की जड़, बड़ी हरड़, सोंठ तथा पिप्पलामूल काढ़ा, जौखार मिलाकर कफज्वर में बारहवें दिन पीना चाहिये। यह क्वाथ भी 'पाचन' है। वक्तव्य- प्रायः आम के दोष से ('दोषा हि आमाशयाश्रयाः बहिर्निरास्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्युः') ज्वर उत्पन्न होते हैं, अतः उनमें लंघन ('ज्वरादौ लङ्घनं प्रोक्तम्') किया जाता है। यद्यपि वह आवश्यकतानुसार (जब तक आम ज्वर के लक्षण विद्यमान रहें) किया जाता है, तथापि-‘वातिकः सप्तरात्रेण दशरात्रेण पैत्तिकः। श्लैष्मिको द्वादशाहेन ज्वरः पाकमुपैति हि।।'-के अनुसार वातज्वर में सातवें दिन, पित्तज्वर में दसवें दिन तथा कफज्वर में बारहवें दिन दोष पक जाने पर क्वाथ देने का विधान किया गया है। इस बीच प्रतिदिन वैद्य रोगी को शिक्षा दें कि तुम स्नान, स्नेहपान, दस्त की दवा, दिन में सोना, मैथुन, व्यायाम, शीतल जल, क्रोध, बाहरी हवा का सेवन मत करना तथा गर्म जल अथवा गर्म करके ठण्डा किया हुआ जल पीना इत्यादि। औषध में मृत्युञ्जय आदि रस एवं स्वरस तथा षडङ्गपानीय आदि दे सकते हैं और पाचन क्वाथ देने के लिए जो दिन निश्चित किये हैं, यदि उक्त दिनों में भी दोष पूर्णरूप से पचे न हों तो पाचन क्वाथ देना चाहिये। यदि लंघनादि से ही दोषपाक हो जाये तो शमन अर्थात् ज्वरनाशक औषधि देनी चाहिये। भूनिम्बादि क्वाथ भूनिम्बनिम्बपिप्पल्यः शठी शुण्ठी शतावरी।।18।। गुडूची बृहती चेति क्वाथो हन्यात् कफज्वरम्। चिरायता, नीम की छाल, पीपल, कचूर, सोंठ, शतावर, गिलोय और बनभण्टा, इनका काढ़ा कफज्वर को नष्ट करता है। पटोलादि क्वाथ पटोलत्रिफलातिक्ताशठीवासामृताभवः ।।19।। क्वाथो मधुयुतः पीतो हन्यात् कफकृतं ज्वरम्। परवल की पत्ती, त्रिफला, कुटकी, कचूर, अडूसा की पत्ती तथा गिलोय का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से कफज्वर को नष्ट करता है। वक्तव्य- उक्त दोनों क्वाथ कफदोषशामक हैं। आमदोष को पकाने वाला काढ़ा 'पाचन' तथा ज्वरनाशक काढ़ा 'शमन' कहलाता है। पञ्चभद्र क्वाथ पर्पटाब्दामृताविश्वकैरातैः साधितं जलम्।।20।। पञ्चभद्रमिदं ज्ञेयं वातपित्तज्वरापहम्। पित्तपापड़ा, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ तथा चिरायता- इनका यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ 'पञ्चभद्र' नाम से प्रसिद्ध है। यह वातपित्त (द्वन्द्वज) ज्वर को नष्ट करता है। कण्टकार्यादि क्वाथ क्षुद्राशुण्ठीगुडूचीनां कषायः पौष्करस्य च।।21।। कफवाताधिके पेयो ज्वरे वापि त्रिदोषजे। कासश्वासारुचिकरे पार्श्वशूलविधायिनि।।22।। कण्टकारी, सोंठ, गिलोय तथा पोहकरमूल का काढ़ा कफ-वातज्वर तथा त्रिदोषज्वर में पीना चाहिये और यह काढ़ा कास, श्वास तथा अरुचि को हरता है तथा पसली की पीड़ा (निमोनिया) को नष्ट करता है। आरग्वधादि क्वाथ आरग्वधकणामूलमुस्तातिक्ताभयाकृतः । क्वाथः शमयति क्षिप्रं ज्वरं वातकफोद्भवम्।।23।। आमशूलप्रशमनो भेदी दीपनपाचनः। अमलतास की गुद्दी, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी तथा बड़ी हरड़ का काढ़ा वात-कफ-ज्वर को तथा आमशूल को शीघ्र ही शान्त करता है, यह दस्तावर भी है, अग्नि को बढ़ाता है आम दोष को पकाता है। अमृताष्टक क्वाथ अमृतारिष्टकटुकामुस्तेन्द्रयवनागरैः ।।24।। पटोलचन्दनाभ्यां च पिप्पलीचूर्णयुक् शृतम्। अमृताष्टकमेतच्च पित्तश्लेष्मज्वरापहम्।।25।। छर्द्यरोचकहल्लासदाहतृष्णाविनाशनम् । गिलोय, नीम की छाल, कुटकी, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोंठ, परवल की पत्ती तथा लालचन्दन का काढ़ा पीपल का चूर्ण डालकर पीने से पित्त-कफ-ज्वर को नष्ट करता है, साथ ही कै, अरुचि, जी मिचलाना, दाह तथा प्यास का भी नाश होता है। इसका नाम 'अमृताष्टक' है। पटोलादिगण क्वाथ (पटोलं चन्दनं मूर्वात्तिक्तापांठामृतागणः।।26।। पित्तश्लेष्मज्वरच्छर्द्दिदाहकण्डूविषापहः ।)