भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

द्वितीयोऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 105 जाता है। आप आवश्यकतानुसार नमक, हींग तथा जीरा आदि का भी प्रयोग कर सकते हैं। इससे यह और भी स्वादिष्ट बन जायेगा। पानादि विधि क्षुण्णं द्रव्यपलं साध्यं चतुःषष्टिपले जले। अर्धशिष्टं च तद्देयं पाने भक्तादिसंविधौ ।। 157 ।। एक पल द्रव्य को जौकुट कर चौसठ पल जल में पकाना चाहिये और आधा शेष रहने पर पीने के लिए तथा भात आदि (पेया, यूष आदि) बनाने के लिए काम में लाना चाहिये। वक्तव्य-रोगी के पीने के लिए जल उक्त विधि से तैयार करना चाहिये और इसी जल में रोगी के लिए पथ्य भी तैयार किया जा सकता है। षडङ्ग-पानीय उशीरपर्पटोदीच्यमुस्तनागरचन्दनैः । जलं शृतं हिमं पेयं पिपासाज्वरनाशनम् ।। 158 ।। खस, पित्तपापड़ा, नेत्रबाला, नागरमोथा, सोंठ तथा लालचन्दन से पकाये हुये और ठंडा किये हुये जल को पीने से प्यास तथा ज्वर का नाश होता है। वक्तव्य-यह पानीय अपने आश्चर्यजनक गुणों के कारण इतना प्रसिद्ध और प्रचलित हो गया है, कि प्रत्येक चिकित्सक प्रतिदिन इससे ज्वरपीड़ित जनसमाज को लाभ पहुँचा रहा है। इसका नाम 'षडङ्ग-पानीय' है। इससे ज्वर के सभी उपद्रव शान्त हो जाते हैं। जो लोग इसका प्रयोग नहीं करते हों वे भी इस उत्तम योग से लाभ उठा सकते हैं। उष्णोदक-विधि अष्टमेनांशशेषेण चतुर्थेनार्थकेन वा। अथवा क्वथनेनैव सिद्धमुष्णोदकं वदेत् ।। 159 ।। जल को पकाने पर आठवाँ भाग अवशिष्ट रहने पर (इसे 'आठ कटोरी का पानी' भी कहा जाता है) तथा चौथाई भाग अवशिष्ट रहने पर अथवा केवल क्वाथ (उबाल देने) मात्र से ही सिद्ध (उत्तम) 'उष्णोदक' मान लिया जाता है। वक्तव्य-प्रायः रोगियों को उष्णजल ही दिया जाता है और वह उक्त प्रकार से ही उष्ण करके देना चाहिये। उष्णोदक के गुण श्लेष्माामवातमेदोघ्नं वस्तिशोधनदीपनम्। कासश्वासज्वरहरं पीतमुष्णोदकं निशि ।। 160 ।। यदि गर्म जल रात्रि में (सोते समय) पिया जाये तो कफ, आमवात तथा मेदोदोष को नष्ट करता है वस्ति (मूत्राशय) को शुद्ध करता है, अग्नि को दीप्त करता है, खाँसी, श्वास तथा ज्वर को हरता है। वक्तव्य-उक्त गुणों के अतिरिक्त यह उष्णोदक पीनस (जुकाम) तथा कोष्ठबद्धता कब्जियत आदि को भी हरता है। क्षीरपाक-विधि क्षिरमिष्टगुणं द्रव्यात् क्षीरान्नीरं चतुर्गुणम् । ^1क्षीरावशेषं कर्तव्यं क्षीरपाके त्वयं विधिः ।। 161 ।। द्रव्य से आठ गुना दूध तथा दूध से चौगुना जल मिलाकर उसे पकाना चाहिये और पकते-पकते जब दूध मात्र शेष रह जाये तो उतार लें। यही क्षीरपाक की विधि है। पञ्चमूलपक्व-क्षीर (सर्वज्वराणां जीर्णानां क्षीरं भैषज्यमुत्तमम्। श्वासात् कासाच्छिरःशूलात् पार्श्वशूलात् सपीनसात् ।। 162 ।। मुच्यते ज्वरितः पीत्वा पञ्चमूलीशृतं पयः।) सभी प्रकार के दूध जीर्ण (पुराने) ज्वरों की उत्तम औषधि तो हैं ही, किन्तु लघुपञ्चमूल (शालपर्णी, पृश्निपर्णी, वनभण्टा, कण्टकारी तथा गोखरू) के साथ पके हुये दूध को पाकर ज्वर से पीड़ित मनुष्य श्वास, कास, शिर की पीड़ा, पार्श्वशूल (पसली की पीड़ा) तथा पीनस (जुकाम) से भी मुक्त हो जाता है। त्रिकण्टकपक्व-क्षीर (त्रिकण्टकबलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् ।। 163 ।। वर्चोमूत्रविबन्धघ्नं कफज्वरहरं पयः।) गोखरू, बरियारा, भटकटैया, गुड़ तथा सोंठ से पकाया हुआ दूध पुरीष (मल) तथा मूत्र के बन्ध को नष्ट करता है और कफज ज्वर को हरता है। वक्तव्य-उक्त दोनों ही क्षीर-योगों से वे रोग दूर होते हैं, जिनमें आमदोष की अधिकता के कारण प्रायः दूध पीने की व्यवस्था नहीं की जाती है, किन्तु उक्त औषधियों द्वारा पकाया गया दूध उक्त रोगों का नाशक हो जाता है। शीतोपद्रव चिकित्सा-शीत, वर्षा तथा वायु के लगने से उत्पन्न स्तम्भ, कम्पन आदि उपद्रवों की शान्ति के लिए पञ्चकोल (पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता और सोंठ) तथा '1. क्षीरादष्टगुणं... क्षीरावशेषं तत्पीतं शूलमामोद्भवं जयेत्'।