भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

चतुर्थोऽध्यायः हिमनिर्माणानिकल्पना [ बायाँ स्तम्भ ] हिम-निर्माण-विधि क्षुण्णं द्रव्यपलं सम्यक् षड्भिर्नीरपलैः प्लुतम्। निशोषितं हिमः स स्यात् तथा शीतकषायकः॥ १ ॥ तन्मानं फाण्टवज्ज्ञेयं सर्वत्रैवैष निश्चयः। एक पल (4 तोला) द्रव्य को भली-भाँति कूट-पीसकर मिट्टी के पात्र में डालकर छः पल (24 तोला) जल से भिगोकर रात भर रखा रहने दें, प्रातःकाल छानकर इसे पीयें। इसे 'हिम' तथा 'शीतकषाय' कहा जाता है। इसका परिमाण (प्रक्षेप आदि तथा पीने का) फाण्ट के समान है। वक्तव्य— इसकी भी एक मात्रा दो पल (8 तोला) की है। फाण्ट में तथा मन्थ में चार-चार पल और हिम में छः पल जल डालने का विधान किया गया है और पीने के लिए 'दो पल' की आज्ञा दी है। इसका तात्पर्य यह है कि फाण्ट तथा मन्थ दिन भर में दो बार और हिम तीन बार पीना चाहिये। आम्रादि हिम आम्रं जम्बू च ककुभं चूर्णीकृत्य जले क्षिपेत्॥ २ ॥ हिमं तस्य पिबेत्प्रातः सक्षौद्रं रक्तपित्तजित्। आम, जामुन तथा अर्जुन (कौह) की छाल का चूर्ण बनाकर जल में डाल दें। इसका हिम प्रातःकाल मधु मिलाकर पीये। यह रक्तपित्त को जीत लेता है। मरिचादि हिम मरिचं मधुयष्टी च काकोदुम्बरपल्लवाः॥ ३ ॥ नीलोत्पलं हिमस्तज्जस्तृष्णाच्छर्दिनिवारणः। मरिच (20-30 दाना), मुलेठी, कठगूलर के कोमल पत्ते और नीलाकमल (नीलोफर) इनका हिम तृष्णा (प्यास) तथा कै (वमन) को रोकता है। नीलोत्पलादि हिम नीलोत्पलं बला द्राक्षा मधूकं मधुकं तथा॥ ४ ॥ [ दायाँ स्तम्भ ] उशीरं पद्मकं चैव काश्मरी च परूषकम्। एतच्छीतकषायश्च वातपित्तज्वराञ्जयेत्॥ ५ ॥ सप्रलापभ्रमच्छर्दिमोहतृष्णानिवारणः। नीलोत्पल (नीलोफर), बरियारा, मुनक्का, महुआ का फूल, मुलेठी, खस, पद्माकाठ, गम्भार तथा फालसा के फल अथवा छाल का बनाया हुआ 'शीतकषाय' या 'हिम' वातपित्त प्रधान ज्वरों को जीतता है और प्रलाप (बड़-बड़ाना), भ्रम, कै, मोह (बेहोशी) तथा तृष्णा को दूर करता है। अमृता हिम अमृताया हिमः पेयो जीर्णज्वरहरः स्मृतः॥ ६ ॥ वासायाश्च हिमः कासं रक्तपित्तज्वराञ्जयेत्। गिलोय का 'हिम' पात्र से जीर्णज्वर को हरता है और अडूसा की पत्ती का 'हिम' कास (खाँसी), रक्तपित्त तथा ज्वरों को जीतता है। धान्यक हिम प्रातः सशर्करः पेयो हिमो धान्यकसम्भवः॥ ७ ॥ अन्तर्दाहं तथा तृष्णां जयेत् स्रोतोविशोधनः। धनिया का 'हिम' प्रातःकाल चीनी या मिश्री डालकर पीना चाहिये। यह अन्तर्दाह (भीतरी जलन) तथा तृष्णा को जीतता है और स्रोतों (मूत्रवाही) को शुद्ध करता है। धान्यकादि हिम धात्रीधान्याकवासानां द्राक्षापर्पटयोर्हिमः॥ ८ ॥ रक्तपित्तं ज्वरं दाहं तृष्णां शोषं च नाशयेत्। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे हिमकल्पना नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४ ॥ आँवला, धनियाँ, अडूसा अथवा मुनक्का तथा पित्तपापड़ा

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 146, कुल 356 में से · BharatKosha