भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

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षष्ठोऽध्यायः] चूर्णकल्पना 117


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

सेवन किया जाता है वह 'अनुपान' कहलाता है। इस (अनुपान) की सहायता से उक्त पदार्थों (औषध) का रस पतला तैयार होता है, जिससे वह सरलतापूर्वक आँतड़ियों (पाचक-संस्थान) में आचूषित होकर रस तथा रक्त में पहुँच जाता है और आवश्यक स्थान पर जाकर अपना प्रभाव डालता है। चूर्ण-भावना-विधि द्रवेण यावता सम्यक् चूर्णं सर्वं प्लुतं भवेत्। भावनायाः प्रमाणं तु चूर्णे प्रोक्तं भिषग्वरैः ।। 6 ।। जितने द्रव पदार्थ (नीबूरस आदि) से समस्त चूर्ण भली प्रकार भीग जायें, इतना द्रव पदार्थ चूर्णों की भावना में प्रयुक्त करना चाहिये। यह विद्वान् चिकित्सकों का कथन है। वक्तव्य— चूर्णों को किसी द्रव्य पदार्थ अर्थात् नीबू के रस आदि से भिगोकर सुखा लिया जाता है। इस क्रिया को 'भावना' कहा जाता है। भावना शीतकाल तथा उष्णकाल में देनी चाहिये ताकि चूर्ण निर्विघ्न सूख सके। वर्षाकाल में धूप न मिलने एवं वायु के आर्द्र होने के कारण उसमें सड़न उत्पन्न हो जाती है और चूर्ण खराब हो जाता है। आमलकादि चूर्ण आमलं चित्रक पथ्या पिप्पली सैन्धवस्तथा। चूर्णितोऽयं गणो ज्ञेयः सर्वज्वरविनाशनः ।। 7 ।। भेदी रुचिकरः श्लेष्मजेता दीपनपाचनः। आँवला, चित्ता, हरड़, पीपल तथा सेंधा नमक का चूर्ण सभी प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है। यह दस्तावर है, रुचि को बढ़ाता है, कफ को जीतता है, दीपन और पाचन है। वक्तव्य— यह 'आमलक्यादिगण' सु० सू० अ० 38 का है, किन्तु आचार्य शार्ङ्गधर ने इसमें 'सैन्धवलवण' मिलाकर 'सोने में सुगन्ध' वाली कहावत को चरितार्थ कर दिया है। पिप्पली चूर्ण मधुना पिप्पलीचूर्णं लिहेत् कासज्वरापहम् ।। 8 ।। हिक्काश्वासहरं कण्ठ्यं प्लीहघ्नं बालकोचितम्। पीपल का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटने से कास तथा ज्वर को नष्ट करता है, हिचकी और श्वास को हरता है, कण्ठ को साफ करता है और प्लीहा (तिल्ली) की वृद्धि का नाश करता है। यह चूर्ण बालकों के उक्त रोगों में अत्यन्त लाभप्रद है।


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

त्रिफला चूर्ण एका हरीतकी योज्या द्वौ च योज्यौ बिभीतको ।। 9 ।। चत्वार्यामलकान्येवं त्रिफलैषा प्रकीर्तिता। त्रिफला मेहशोथघ्नी नाथयेद् विषमज्वरान् ।। 10 ।। दीपनी श्लेष्मपित्तघ्नी कुष्ठहन्त्री रसायनी। संयुक्ता सर्पिर्मधुभ्यां सैव नेत्राामयाञ्जयेत् ।। 11 ।। एक हरड़, दो बहेड़ा तथा चार आँवला इस प्रकार मिलाने से 'त्रिफला' कहा जाता है। उक्त त्रिफला चूर्ण प्रमेह और सूजन को तथा विषम ज्वरों को नष्ट करता है। जठराग्नि को बढ़ाता है, कफ तथा पित्त को नष्ट करता है, कुष्ठ (कोढ़) को हरता है तथा रसायन है। घी और शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से नेत्र-रोगों को जीतता है। वक्तव्य— त्रिकटु तथा त्र्यूषण शब्द का तात्पर्य है—'त्रीणि ऊष्णानि कटुद्रव्याणि यस्मिन् तत् त्र्यूषणम्'। अर्थात् इसमें सोंठ, मरिच, पीपल मिलाया जाता है। इसकी मात्रा दो-तीन माशा पर्याप्त होती है। त्र्यूषण चूर्ण पिप्पली मरिचं शुण्ठी त्रिभिस्त्र्यूषणमुच्यते। दीपनं श्लेष्ममेदोघ्नं कुष्ठपीनसनाशनम् ।। 12 ।। जयेदरोचकं सामं मेहगुल्मगलामयान्। पिप्पली, मरिच, सोंठ इन तीन द्रव्यों को त्र्यूषण कहा जाता है। यह दीपन है, कफ तथा मेदोदोष को नाश करता है। कुष्ठ, पीनस (जुकाम), अरुचि, आमदोष, प्रमेह, गुल्म (वायुगोला) तथा गले के रोगों को जीतता है। वक्तव्य— त्रिकटु या त्र्यूषण दोनों शब्द समानार्थक हैं, अतएव पर्यायवाची हैं। तात्पर्य यह है कि इसमें तीन द्रव्य कटुरस-प्रधान अथवा दाहकारक होते हैं, जिनके नाम ऊपर दिये गये हैं। त्रिकटु चूर्ण की मात्रा 1-2 माशा स्वीकार की जाती है। पञ्चकोल चूर्ण पिप्पलीचव्यविश्वाह्नापिप्पलीमूलचित्रकैः ।। 13 ।। पञ्चकोलमिति ख्यातं रुच्यं पाचनदीपनम्। आनाहप्लीहगुल्मघ्नं शूलश्लेष्मोदरापहम् ।। 14 ।। पीपल, चव्य, सोंठ, पिप्पलामूल तथा चीता-इन पाँच द्रव्यों का सम्मिलित नाम 'पञ्चकोल' है। यह रुचिकर, दीपन तथा पाचन है। आनाह (आमाशय तथा पक्वाशय की गति