भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 356 में से

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पृष्ठ 158

122 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

[बायाँ स्तम्भ] अनारदाना (खट्टा) दो पल (8 तोला), खाँड (चीनी) दस पल (40 तोला), त्रिगन्ध (दालचीनी, बड़ी इलायची तथा तेजपत्ता) एक पल (4 तोला) तथा त्रिकटु (सोंठ, मरिच तथा पीपल) तीन पल (12 तोला), इन सबका चूर्ण 'दाडिमाष्टक चूर्ण' कहलाता है। उक्त चूर्ण रुचिकारक है, दीपन (अग्निवर्द्धक) है, कण्ठ के रोगों को हरता है, ग्राही (मलरोधक) है, कास तथा ज्वर को नष्ट करता है।

बृहद् दाडिमाष्टक चूर्ण दाडिमस्य पलान्यष्टौ शर्करायाः पलाष्टकम्। पिप्पली पिप्पलीमूलं यवानी मरिचं तथा ।। 62 ।। धान्यकं जीरकं शुण्ठी प्रत्येकं पलसम्मितम्। कर्षमात्रा तुगाक्षीरी त्वक्पत्रैलाश्च केशरम् ।। 63 ।। प्रत्येकं कोलमात्राः स्युस्तच्चूर्णं दाडिमाष्टकम्। अतीसारं क्षयं गुल्मं ग्रहणीं च गलग्रहम् ।। 64 ।। मन्दाग्निं पीनसं कासं चूर्णमेतद् व्यपोहति।

अनारदाना (खट्टा) 8 पल (32 तोला), चीनी 8 पल (32 तोला), पीपल, पीपलामूल, अजवायन, मरिच, धनियां, सफेद जीरा तथा सोंठ प्रत्येक द्रव्य एक-एक पल (4-4 तोला), वंशलोचन एक कर्ष (1 तोला), दालचीनी, तेजपत्ता, बड़ी इलायची तथा नागकेसर प्रत्येक एक-एक कोल (6-6 माशा)। इसका नाम भी 'दाडिमाष्टक चूर्ण' है। यह चूर्ण अतिसार, क्षय, गुल्म, ग्रहणीरोग, गलग्रह (गले की रुकावट), मन्दाग्नि, पीनस (जुकाम) तथा कास को नष्ट करता है।

पिप्पल्यादि चूर्ण (पिप्पली बृहती व्याघ्री यवक्षारकलिङ्गकाः ।। 65 ।। चित्रकं सारिवा पाठा शठी लवणपञ्चकम्। तच्चूर्णं पाययेद् दध्ना सुरयोष्णाम्बुनापि वा ।। 66 ।। मारुतग्रहणीदोषशमनं परमं हितम्।)

पीपल, बनभण्टा, कण्टकारी, जौखार, इन्द्रजौ, चीता की जड़, सारिवा, पाठा, कचूर तथा लवणपञ्चक (पाँचों नमक), इनका चूर्ण दही के साथ अथवा सुरा (मद्य या आसव-अरिष्टों) के साथ अथवा उष्ण जल के साथ पिलाना चाहिये। यह चूर्ण वातजनित ग्रहणी दोष को शान्त करने वाली उत्तम औषध है।

लवङ्गादि चूर्ण लवङ्गं शुद्धकर्पूरमेलात्वङ्नागकेशरम् ।। 67 ।। जातीफलमुशीरं च नागरं कृष्णजीरकम्।


[दायाँ स्तम्भ] कृष्णागुरुस्तुगाक्षीरी मांसी नीलोत्पलं कणा ।। 68 ।। चन्दनं तगरं बालं कङ्कोलं चेति चूर्णयेत्। समभागानि सर्वाणि सर्वेभ्योऽर्धा सिता भवेत् ।। 69 ।। लवङ्गाद्यमिदं चूर्णं राजाहं वह्निदीपनम्। रोचनं तर्पणं वृष्यं त्रिदोषघ्नं बलप्रदम् ।। 70 ।। हृद्रोगं कण्ठरोगं च कासं हिक्कां च पीनसम्। यक्ष्माणं तमकं श्वासमतीसारमुरःक्षतम् ।। 71 ।। प्रमेहरुचिगुल्मादीन् ग्रहणीमपि नाशयेत्।

लौंग, शुद्ध कपूर (देशी कपूर), बड़ी इलायची, दालचीनी, नागकेसर, जायफल, खस, सोंठ, काला जीरा, काला अगुरु, वंशलोचन, जटामांसी, नीला कमल, पीपल, सफेद चन्दन, तगर, नेत्रबाला तथा शीतलचीनी-इन द्रव्यों को समान भाग में लेकर चूर्ण बनायें और समस्त चूर्ण से आधी चीनी मिला दें। यह चूर्ण 'लवङ्गादि चूर्ण' कहलाता है। यह चूर्ण राजाओं के योग्य अर्थात् बहुत उत्तम है, जठराग्नि को बढ़ाता है, रोपण (यदि व्रण रोगी को खिलाया जाये तो व्रण भर जाता) है, तर्पण (तृप्तिकारक या धातुवर्द्धक) है, त्रिदोषशामक, बलवर्द्धक तथा हृदयरोग, कण्ठरोग, कास, हिचकी, पीनस (जुकाम), यक्ष्मा, तमकश्वास (प्रायः सभी श्वास रोगी इसी श्वास रोग से पीड़ित रहते हैं), अतिसार, उरःक्षत (वक्षःस्थल का भीतरी घाव), प्रमेह, अरुचि, गुल्म आदि रोगों और ग्रहणी रोग को भी नष्ट करता है।

जातीफलादि चूर्ण जातीफललवङ्गैलापत्रत्वङ्नागकेशरैः ।। 72 ।। कर्पूरचन्दनतिलैस्त्वक्क्षीरीतगरामलैः । तालीसपिप्पलीपथ्यास्थूलजीरकचित्रकैः ।। 73 ।। शुण्ठीविडङ्गमरिचैः समभागविचूर्णितैः। यावन्त्येतानि सर्वाणि कुर्याद्भङ्गां च तावतीम् ।। 74 ।। सर्वचूर्णसमा देया शर्करा च भिषग्वरैः। कर्षमात्रं ततः खादेन्मधुना प्लावितं सुधीः ।। 75 ।। अस्य प्रभावाद् ग्रहणीकासश्वासारुचिक्षयाः। वातश्लेष्मप्रतिश्यायाः प्रशमं यान्ति वेगतः ।। 76 ।।

जायफल, लौंग, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, देशी कपूर, सफेद चन्दन, काला तिल, वंशलोचन, तगर, आँवला, तालीसपत्र, पीपल, बड़ी हरड़, सफेद जीरा, चीता, सोंठ, वायविडंग तथा मरिच-इन सबका समान चूर्ण बनायें; जितना यह चूर्ण हो उतनी ही भाँग पीसकर मिला दें और इस समस्त चूर्ण के समान भाग चीनी (खाँड) मिलानी चाहिये।