शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ] चूर्णकल्पना 129 मुसल्यादि चूर्ण (मुसलीकन्दचूर्णं तु गुडूचीसत्त्वसंयुतम्। वानरीगोक्षुराभ्यां च शाल्मलीशर्करमलैः।। 160 ।। आलोड्य घृतदुग्धेन पाययेत् कामवर्धनम्।) सफेद मुसली, सतगिलोय, किवाँच के बीज, गोखरू, सेमल की मुसली, चीनी एवं आँवला, इन सबका चूर्ण घी और दूध में मिलाकर पिलाना चाहिये। इससे मैथुनेच्छा बढ़ती है। **वक्तव्य—**उक्त तीनों योग वीर्यवर्धक तथा बलवर्धक हैं। अतः कृशता, शुक्रहीनता तथा दुर्बलता में इनका प्रयोग करना चाहिये। नवायस चूर्ण चित्रकस्त्रिफला मुस्तं विडङ्गं त्र्यूषणानि च।। 161 ।। समभागानि कार्याणि नव भागा हुतायसः। एतदेकीकृतं चूर्ण मधउसर्पिर्युतं लिहेत्।। 162 ।। गोमूत्रमथवा तक्रमनुपाने प्रशस्यते। पाण्डुरोगं जयत्युग्रं हृद्रोगं च भगन्दरम्।। 163 ।। शोथकुष्ठोदराशांसि मन्दाग्निमरुचिं कृमीन्। चीता की जड़, हरड़, बहेड़ा, आँवला, नागरमोथा, वायविडंग, सोंठ, मरिच तथा पीपल ये सब द्रव्य समान भाग (1-1 तोला) और लौह भस्म नौ भाग (9 तोला), इन सबका एक में मिलाया हुआ चूर्ण मात्रानुसार घी तथा शहद के साथ मिलाकर चाटना चाहिये। अनुपान में गोमूत्र अथवा तक्र (मट्ठा) अच्छा माना जाता है। यह चूर्ण भीषण पाण्डुरोग, हृदयरोग, भगन्दर, शोथ (सूजन), कुष्ठ (कोढ़), उदररोग एक बवासीर, मन्दाग्नि, अरुचि तथा कृमियों को जीतता है। इसका नाम 'नवायस चूर्ण' है। **वक्तव्य—**यह योग पाण्डु कामला तथा इनके उपद्रवों की परमोत्तम औषध है। पाण्डुरोग में इसके साथ अधिक से अधिक तक्र या अर्ध-विलोड़ित दही पिलाना चाहिये। इसमें लोहभस्म उत्तम से उत्तम डालनी चाहिये। आकारकरभादि चूर्ण आकारकरभः शुण्ठी कङ्कोलं कुङ्कुमं कणा।। 164 ।। जातीफलं लवङ्गं च चन्दनं चेति कार्षिकान्। चूर्णानि मानतः कुर्यादहिफेनं पलोन्मितम्।। 165 ।। सर्वमेकीकृतं चूर्ण माषैकं मधुना लिहेत्। शुक्रस्तम्भकरं चूर्ण पुंसामानन्दकारकम्।। 166 ।। नारीणां प्रीतिजननं सेवेत निशि कामुकः। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे चूर्णकल्पना नाम षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।। अकरकरा, सोंठ, शीतलचीनी, केशर, पीपल, जायफल, लौंग तथा सफेद चन्दन, इन सबका 1-1 तोला चूर्ण और अफीम एक पल (4 तोला), सबको एक में मिलाकर रख लें। इसमें से एक माशा चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिये। यह चूर्ण मैथुन काल में शुक्र को रोकता और पुरुषों को आनन्द (मैथुन-सम्बन्धी आनन्द) देता है तथा स्त्रियों में प्रेम उत्पन्न करता है। अतएव कामी मनुष्य रात्रि में इस चूर्ण का सेवन करे। **वक्तव्य—**जिन लोगों का शुक्र शीघ्र स्खलित हो जाता है, उन्हीं लोगों को इस चूर्ण का सेवन करना चाहिये और जो लोग आवश्यकता के बिना ही केवल मैथुनानन्द की लालसा के वशीभूत होकर स्तम्भन औषधियों का प्रयोग करते हैं, उन्हें भयानक हानि उठानी पड़ती है। **पञ्चवल्कल चूर्ण—**जब शीतला के दानों से पंछा बहने लगे तब उन पर पंचवल्कल (बड़, पीपल, पाकर, गूलर और पारस पीपल) की छाल का चूर्ण अथवा उपलों की भस्म अथवा गोबर का चूर्ण का बुरकना चाहिये। **माषादि चूर्ण—**उड़द का चूर्ण (भुना हुआ), मुलेठी, विदारीकन्द, मधु की चीनी का चूर्ण दूध के साथ पिलाना चाहिये। यह सोमरोग का उत्तम औषध है। **बकुलत्वक् चूर्ण—**मौलसिरी की छाल का चूर्ण दाँतों पर मलना चाहिये। इससे हिलते हुये दाँत भी वज्र के समान दृढ़ हो जाते हैं। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का छठा अध्याय समाप्त।। 6 ।।