शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः ] वटककल्पना 133 मुशलीचित्रकौ ज्ञेयावष्टभागमितौ पृथक् । शिवा बिभीतकी धात्री विडङ्गं नागरं कणा ।। 29 ।। भल्लातः पिप्पलीमूलं तालीसं च पृथक्पृथक् । चतुर्भागप्रमाणानि त्वगेला मरिचं तथा ।। 30 ।। द्विभागमात्राणि पृथक् तत्सर्व्वेकत्र चूर्णयेत् । द्विगुणेन गुडेनाथ वटकान् कारयेद् बुधः ।। 31 ।। प्रबलाग्निकरा एते तथार्शोनशनाः पराः । ग्रहणीं वातकफजां श्वासं कासं क्षयामयम् ।। 32 ।। प्लीहानं श्लीपदं शोथं हिक्कां मेहं भगन्दरम् । निहन्युः पलितं वृष्यास्तथा मेध्या रसायनाः ।। 33 ।। सूखा सूरण तथा विधारा का चूर्ण पृथक्-पृथक् 16-16 तोला, सफेद मुसली तथा चीता का चूर्ण पृथक्-पृथक् 8-8 तोला, हरड़, बहेड़ा, आँवला, वायविडंग, सोंठ, पीपल शुद्ध भिलावा, पीपलामूल तथा तालीसपत्र प्रत्येक का चूर्ण 4-4 तोला और दालचीनी, बड़ी इलायची तथा मरिच प्रत्येक का चूर्ण दो-दो तोला लेकर दुगुने गुड़ के साथ बटक (बड़ी-बड़ी गोलियाँ) बना लें। ये बटक अग्नि को प्रबल करते हैं, परमोत्तम अर्शोंनाशक हैं, वातकफ-जनित ग्रहणी रोग, श्वास, कास, क्षयरोग, प्लीहा-विकार, श्लीपद (फीलपाँव), शोथ, प्रमेह, भगन्दर तथा अकालपलित को नष्ट करते हैं, वृष्य (वीर्यवर्द्धक), मेध्य (बुद्धिवर्द्धक) तथा रसायन (जरा- व्याधिविनाशक) हैं। इस योग का नाम 'सूरण-बटक' है। मण्डूर-बटक त्रिफला त्र्यूषणं चव्यं पिप्पलीमूलचित्रकौ। दारु माक्षिकधातुस्त्वग्दार्वी मुस्त विडङ्गकम्।। 34 ।। प्रत्येकं कर्षमात्राणि सर्वं द्विगुणितं तथा। मण्डूरं चूर्णयेत् सर्वं गोमूत्रेऽष्टगुणे क्षिपेत् ।। 35 ।। पक्त्वा च वटकान् कृत्वा दद्यात् तक्रानुपानतः । कामलापाण्डुमेहार्शःशोथकुष्ठकफामयान् ।। 36 ।। ऊरुस्तम्भमजीर्णं च प्लीहानं नाशयेदपि । हरड़, बहेड़ा, आँवला, चव्य, पीपलामूल, चीता की जड़, देवदारु, सोनामाखी की भस्म, दारुहल्दी, नागरमोथा तथा वायविडंग प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण एक-एक तोला तथा शुद्ध मण्डूर भस्म उक्त सब द्रव्यों की अपेक्षा दुगुना (दो-दो तोला) लेकर आठ गुने गोमूत्र में डालकर (कड़ाही में डाल) अग्नि पर चढ़ाकर मन्द आँच से पकाये और गाढ़ा होने पर बड़ी-बड़ी या झड़बेर की-सी गोलियाँ बनायें। तक्र (मट्ठा) के अनुपान से इनका सेवन करे। यह कामला (पीलिया), पाण्डुरोग, प्रमेह, बवासीर, शोथ, कुष्ठ, कफरोग, ऊरुस्तम्भ, अजीर्ण तथा प्लीहा को नष्ट करता है। वक्तव्य-इस योग का नाम 'मण्डूर-बटक' है। इसमें उत्तम से उत्तम मण्डूर भस्म डालना चाहिये। यह पाण्डुरोग की सर्वश्रेष्ठ औषध है। इसके साथ यथेष्ट मट्ठा पिलाना चाहिये और नमक छुड़ाकर चना-गेहूँ के आटा की रोटी घी के साथ खिलानी चाहिये। पिप्पली-मोदक (क्षौद्राद् द्विगुणितं सर्पिर्घृताद् द्विगुणपिप्पली ।। 37 ।। सिता द्विगुणिता तस्याः क्षीरं देयं चतुर्गुणम् । चातुर्जातं क्षौद्रतुल्यं पक्त्वा कुर्याच्च मोदकान् ।। 38 ।। धातुस्थांश्च ज्वरान् सर्वान् श्वासं कासं च पाण्डुताम् । धातुक्षयं वह्निमान्द्यं पिप्पलीमोदको जयेत् ।। 39 ।।) मधु से दुगुना घी, घी से दुगुना पिप्पली चूर्ण, पिप्पली से दुगुनी चीनी, चीनी से दुगुना दूध और मधु के समान चतुर्जात (दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता और नागकेसर का सम्मिलित चूर्ण), इन्हें मिलाकर धीमी आँच से पकायें, जब गाढ़ा हो जाये तब लड्डू बना लें। ये लड्डू रस-रक्त आदि सब धातुओं में स्थित ज्वरों को, श्वास, कास, पाण्डुरोग, धातुक्षय (प्रमेह आदि में धातुओं का जाना) तथा मन्दाग्नि को जीतते हैं। इसका नाम 'पिप्पली-मोदक' है। वक्तव्य-पहले दूध का खोया बनाकर घृत में भली-भाँति भून लेना चाहिये, अन्यथा बिगड़ जाने का भय बना रहता है फिर उसमें दूसरी वस्तुएँ मिलाकर मोदक बना लेने चाहिये। मात्रा-एक तोला, अनुपान यथोचित। चन्द्रप्रभा बटी चन्द्रप्रभा वचा मुस्तं भूनिम्बामृतदारुकम्। हरिद्रातिविषा दार्वी पिप्पलीमूलचित्रकौ ।। 40 ।। धान्यकं त्रिफला चव्यं विडङ्गं गजपिप्पली । व्योषं माक्षिकधातुश्च द्वौ क्षारौ लवणत्रयम् ।। 41 ।। एतानि शाणमात्राणि प्रत्येकं कारयेद् बुधः । त्रिवृद्दन्तीपत्रकं च त्वगेला वंशरोचना ।। 42 ।। प्रत्येकं कर्षमात्राणि कुर्यादेतानि बुद्धिमान्। द्विकर्षं हतलोहं स्याच्चतुष्कंर्षा सिता भवेत् ।। 43 ।। शिलाजत्वष्टकर्षं स्यादष्टौ कर्षंश्च गुग्गुलोः । एभिरेकत्र सञ्चूर्णैः कर्तव्या गुटिका शुभा ।। 44 ।। चन्द्रप्रभेति विख्याता सर्वरोगप्रणाशिनी । प्रमेहान् विंशतिं कृच्छ्रं मूत्राघातं तथाश्मरीम् ।। 45 ।।