भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

140 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे उनको उक्त श्लोकों पर ध्यान देना चाहिये। चरक क० अ० ३ श्लोक 16 में 'स्थिरत्वम्' को 'तोये पतितं च न शीर्यते' वाक्य द्वारा स्पष्ट किया गया है। अवलेह के अनुपान दुग्धमिक्षुरसो यूषः पञ्चमूलकषायजम्। वासाक्वाथो यथायोग्यमनुपानं प्रशस्यते॥4॥ दूध, ईख का रस, यूष (मूँग आदि दालों का रस), पञ्चमूल (लघु पञ्चमूल) का क्वाथ तथा अडूसा का क्वाथ अथवा और जो कुछ उचित हो अवलेहों का अनुपान दिया जा सकता है। वक्तव्य- चूर्ण, गुटिका एवं अवलेहों को खाकर कोई न कोई द्रव पदार्थ अवश्य पीना चाहिये, जिससे पेट में जाकर उक्त पदार्थ घुल जाये अथवा किसी न किसी द्रव में घोलकर पीना चाहिये। देखें-शा० सं म० खं० अ० 6 श्लोक 5। कण्टकारी अवलेह कण्टकारीतुलां नीरद्रोणे पक्त्वा कषायकम्। पादशेषं गृहीत्वा च तस्मिंश्चूर्णानि दापयेत्॥5॥ पृथक्पलानि चैतानि गुडूचीचव्यचित्रकाः। मुस्तं कर्कटशृङ्गी च त्र्यूषणं धन्वयासकः॥6॥ भार्ङ्गी रास्ना शठी चैव शर्करा पलविंशतिः। प्रत्येकं च पलान्यष्टौ प्रदद्याद् घृततैल्योः॥7॥ पक्त्वा लेहत्वमानीय शीते मधुपलाष्टकम्। चतुष्पलं तुगाक्षीर्याः पिप्पलीनां चतुष्पलम्॥8॥ क्षिप्त्वा निदध्यात् सुदृढे मृन्मये भाजने शुभे। लेहोऽयं हन्ति हिक्कार्तिश्वासकासानशेषतः॥9॥ एक तुला (5 सेर) कण्टकारी (भटकटैया) के पञ्चांग को जौकुट करके एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) जल में क्वाथ करे और चतुर्थांश शेष रहने पर छानकर क्वाथ को ले लें। इस क्वाथ में निम्नलिखित द्रव्यों के कपड़छन चूर्ण एक-एक पल (4-4 तोला) डाल दें। वे द्रव्य ये हैं-गिलोय, चव्य, चीता की जड़, नागरमोथा, काकड़ासिंगी, सोंठ, मरिच, पिप्पली, धमासा, भारंगी, रायसन, कचूर। चीनी या मिश्री बीस पल (80 तोला), घी तथा तेल (सरसों का तैल) प्रत्येक आठ-आठ पल (32-32 तोला) डालकर पकायें। जब लेह गाढ़ा हो जाये तो चूल्हे पर से उतार लें, तत्पश्चात् सर्वथा शीतल हो जाने पर मधु आठ पल (32 तोला), वंशलोचन चूर्ण चार पल (16 तोला) तथा पिप्पली का चूर्ण चार पल (16 तोला) डालकर मिला दें और सुदृढ़ तथा साफ, सुन्दर मृत्तिका के पात्र में रख दें। यह अवलेह हिचकी, श्वास तथा कास को पूर्णरूप से नष्ट कर देता है। वक्तव्य-इन सब अवलेहों को चीनी के मर्तबानों अथवा शीशे के पात्रों में रखना चाहिये। च्यवनप्राशावलेह पाटलाऽरणिकाश्मर्यबिल्वारलुकगोक्षुराः । पर्ण्यौ बृहत्यौ पिप्पल्यः शृङ्गी द्राक्षामृताभयाः॥10॥ बला भूम्यामलकी वासा ऋद्धिर्जीवन्तिका शठी। जीवकर्षभकौ मुस्तं पौष्करं काकनासिका॥11॥ मुद्गपर्णी माषपर्णी विदारी च पुनर्नवा। काकोल्यौ कमलं मेदे सूक्ष्मैलागुरुचन्दनम्॥12॥ एकैकं पलसम्मानं स्थूलचूर्णितमौषधम्। एकीकृत्य बृहत्पात्रे पञ्चामलशतानि च॥13॥ पचेद् द्रोणजले क्षिप्त्वा ग्राह्यमष्टांशशेषितम्। ततस्तु तान्यामलानि निष्कुलीकृत्य वाससा॥14॥ दृढहस्तेन सम्पीड़य क्षिप्व्वा तत्र ततो घृतम्। पलसप्तमितं तानि किञ्चिद् भृष्ट्वाल्पवह्निना॥15॥ ततस्तत्र क्षिपेत् क्वाथ खण्डं चार्धतुलोन्मितम्। लेहवत् साधयित्वा च चूर्णानीमानि दापयेत्॥16॥ पिप्पली द्विपला देया तुगाक्षीरी चतुष्पला। प्रत्येकं च त्रिशाणं स्यात् त्वगेलापत्रकेशराः॥17॥ ततस्वेकीकृतं सर्वं क्षिपेत् क्षौद्रं च षट्पलम्। इत्येतच्च्यवनप्रोक्तं च्यवनप्राशसंज्ञितम्॥18॥ लेहं वह्निबलं दृष्ट्वा खादेत् क्षीणो रसायनम्। बालवृद्धक्षतक्षीणा नारीक्षीणाश्च शोषिणः॥19॥ हृद्रोगिणः स्वरक्षीणा ये नरास्तेषु युज्यते। कासं श्वासं पिपासां च वातास्रमुरसो ग्रहम्॥20॥ वातपित्तं शुक्रदोषं मूत्रदोषं च नाशयेत्। मेधा स्मृतिं स्त्रीषु हर्षं कान्तिं वर्णप्रसन्नताम्॥21॥ अस्य प्रयोगादाप्नोति नरो जीर्णाविवर्जितः। पाढल, अरणी, गम्भार, बेल, टेण्टू (सोनापाठा), गोखरू, शालपर्णी, पिठवन, वनभण्टा, कण्टकारी (ये दशमूल के द्रव्य हैं), पीपल, काकड़ासिंगी, मुनक्का, गिलोय, हरड़, बरियारा, भुईं आंवला, अडूसा की पत्ती, ऋद्धि (अभाव में वाराहीकन्द द्विगुण), जीवन्ती, कचूर, जीवक तथा ऋषभक (अभाव में विदारीकन्द द्विगुण), नागरमोथा, पोहकरमूल, काकनासा, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, विदारीकन्द, पुनर्नवा, काकोली तथा