शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 151
उत्पलोशीरमेदाभिस्त्रिफलापञ्चवल्कलैः । कल्कैः कर्षमितैरेतैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७३ ॥ विसर्पलूताविस्फोटविषकीटव्रणापहम् । गौराद्यमिति विख्यातं सर्पिर्विषहरं परम् ॥ ७४ ॥
हल्दी, दारुहल्दी, शालपर्णी, सारिवा, लालचन्दन, श्वेतचन्दन, गिलोय, मुलेठी, कमलकेसर, पद्माकाठ, रक्तकमल, खस, मेदा (अभाव में शतावरी), हरड़, बहेड़ा, आँवला, पञ्चवल्कल (वट, गूलर, पाकर, पीपल एवं वेतस की छाल) प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष लेकर एवं कल्क बनाकर एक प्रस्थ घृत (64 तोला) तथा घृत से चौगुना जल डालकर परिपाक करना चाहिये। यह घृत विसर्प, लूता, विस्फोट (बड़ी माता), कीट विष (कीड़ों के काटने पर) एवं व्रणों को नष्ट करता है। इसका नाम 'गौराद्य घृत' है। यह उत्तम विषनाशक है।
वक्तव्य-गौराद्य घृत का पाठ चक्रदत्त के व्रणशोथाधिकार में भी है, किन्तु द्रव्यों में कुछ हेर-फेर है। इस घृत का प्रायः बाहरी प्रयोग किया जाता है।
मयूर घृत बलामधूकरास्नाभिर्दशमूलफलत्रिकैः । पृथग्द्विपलिकैरेभिर्द्रोणनीरेण पाचयेत् ॥ ७५ ॥ मयूरं पक्षपित्तान्त्रयकृत्पादास्यवर्जितम्। पादशेषं शृतं नीत्वा क्षीरं दत्त्वा च तत्समम् ॥ ७६ ॥ घृतप्रस्थं पचेत् सम्यग्जीवनीयैः पिचून्मितैः । तत्सिद्धं शिरसः पीडां मन्यापृष्ठग्रहं तथा ॥ ७७ ॥ अर्दितं कर्णनासाक्षिजिह्वागलरुजो जयेत्। पाने नस्ये तथाभ्यङ्गे कर्णपूरेषु युज्यते ॥ ७८ ॥ हेमन्तकालशिशिरवसन्तेषु च शस्यते।
बरियारा, मुलेठी, रास्ना, दशमूल एवं त्रिफला प्रत्येक द्रव्य (8-8 तोला) लेकर जौकुट करके एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल में डालकर रख दें। प्रातःकाल इसमें पंख, पित्ताशय, आँतड़ी, यकृत, पाँव एवं मुखरहित मोर (अर्थात् मोर के मांस) को डालकर क्वाथ करे। जब चतुर्थांश अवशिष्ट रह जाये तो छान लें, तत्पश्चात् इस क्वाथ के समान भाग अर्थात् एक आढक (3 सेर 16 तोला) दूध डालकर और जीवनीयगण के प्रत्येक द्रव्य को एक-एक कर्ष लेकर और कल्क बनाकर तथा एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) घृत लेकर सबको एक साथ मिलाकर परिपाक करना चाहिये। जब सिद्ध हो जाये तो छानकर रख लेना चाहिये। यह घृत शिर की पीड़ा को, मन्याग्रह (वातव्याधि), पृष्ठग्रह (पीठ की जकड़न), अर्दित (लकवा) तथा कान, नाक, आँख, जीभ एवं केश सम्बन्धी रोगों को जीतता है। पीने में, नस्य में, अभ्यंग (मालिश) में एवं कर्णपूरण (कान में डालने) में इस घृत का प्रयोग किया जाता है। हेमन्त (मार्गशिर एवं पौष), शिशिर (माघ एवं फाल्गुन) तथा वसन्त (चैत्र एवं वैशाख) ऋतु में इस घृत का सेवन करना उत्तम है।
फल घृत त्रिफला मधुकं कुष्ठं द्वे निशे कटुरोहिणी ॥ ७९ ॥ विडङ्गं पिप्पली मुस्ता विशाला कट्फलं वचा। द्वे मेदे द्वे च काकोल्यौ सारिवे द्वे प्रियङ्गुका ॥ ८० ॥ शतपुष्पा हिङ्गु रास्ना चन्दनं रक्तचन्दनम्। जातीपुष्पं तुगाक्षीरी कमलं शर्करा तथा ॥ ८१ ॥ अजमोदा च दन्ती च कल्कैरेतैश्च कार्षिकैः । जीवद्वत्सैकवर्णाया घृतप्रस्थं च गोः क्षिपेत् ॥ ८२ ॥ चतुर्गुणेन पयसा पचेदारण्यगोमयैः । सुतिथौ पुष्यनक्षत्रे मृद्भाण्डे ताम्रजे तथा ॥ ८३ ॥ ततः पिबेच्छुभदिने नारी वा पुरुषोऽथवा। एतत्सर्पिर्नरः पीत्वा स्त्रीषु नित्यं वृषायते ॥ ८४ ॥ पुत्राननुत्पादयेद्धीमान् वन्ध्यापि लभते सुतम् । अनायुषं या जनयेद् या च सूता पुनः स्थिता ॥ ८५ ॥ पुत्रं प्राप्नोति सा नारी बुद्धिमन्तं शतायुषम् । एतत्फलघृतं नाम भारद्वाजेन भाषितम् ॥ ८६ ॥ अनुक्तं लक्ष्मणामूलं क्षिपेत् तत्र चिकित्सकः ।
हरड़, बहेड़ा, आँवला, मुलेठी, कूठ-मीठा, दारुहल्दी, हल्दी, कुटकी, वायविडंग, पीपल, नागरमोथा, इन्द्रायण की जड़, कायफल, वच, मेदा, महामेदा (अभाव में शतावरी दूनी), काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में दूनी अश्वगन्धा), सारिवा, कृष्णसारिवा, फूलप्रियंगु, सौंफ, हींग, रास्ना, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, चमेली के फूल, वंशलोचन, कमल, चीनी, अजमोदा तथा दन्ती (जमालगोटा) प्रत्येक द्रव्य को एक-एक कर्ष लेकर कल्क बना लें। जीवित बछड़े वाली एक वर्ण की गाय का घृत एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) तथा घृत से चौगुना दूध लेकर इन सब वस्तुओं को एक साथ मिलाकर जंगली उपलों (कण्डों या गोहरों) की अग्नि द्वारा उत्तम तिथियों (नन्दा, भद्रा, जया तथा पूर्णा तिथियाँ) में पुष्यनक्षत्र के दिन मिट्टी अथवा ताम्र के पात्र में परिपाक करना आरम्भ करें। जब तैयार हो जाये तो किसी शुभ दिन में