शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें156 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे पश्चात्) चौगुने जल में पकाकर चतुर्थांश क्वाथ ले लें। कपास के बिनौले, बेर का फल, सन के बीज एवं कुलथी प्रत्येक 14-14 पल (56-56 तोला) लेकर तथा जौकूट करके सब द्रव्यों से चौगुने जल में पकायें, चौथाई शेष रहने पर क्वाथ को छान लें और बकरे का मांस एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) लेकर चौसठ पल (3 सेर 16 तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें। फिर इन सब (तीनों) क्वाथों को एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) तिल तेल में डाल दें और गिलोय, कूठ, सोंठ, रास्ना, पुनर्नवा, एरण्ड की जड़, पीपल, सौंफ, बरियारा, गन्धप्रसारिणी, जटामांसी एवं कुटकी प्रत्येक आधा-आधा पल (2-2 तोला) लेकर कल्क बनाकर उक्त क्वाथ-मिश्रित तेल में डालकर मन्द-मन्द आँच से सिद्ध करें। यह तेल ग्रीवास्तम्भ एवं अपबाहुक, अर्द्धांगशोष (पक्षाघात), आक्षेपक, ऊरुस्तम्भ एवं अपतानक (हिस्टीरिया), शाखाओं (टाँगों एवं बाहों) के कम्पन, शिर के कम्पन, विश्वाची, अर्दित (लकवा) तथा वायु के सभी रोगों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है। इसका नाम 'माषादि तैल' है। शतावरी तैल शतावरी बलायुग्मं पण्यौ गन्धर्वहस्तकः। अश्वगन्धा श्वदंष्ट्रंश्च बिल्वः काशः कुरण्टकः।।133।। एतान् सार्धपलान्भागान् कल्कयेच्च विपाचयेत्। चतुर्गुणेन नीरेण पादशेषं भृतं नयेत्।।134।। नियोज्य तैलप्रस्थे च क्षीरप्रस्थं विनिक्षिपेत्। शतावरीरसप्रस्थं जलप्रस्थं च योजयेत्।।135।। शतावरीदेवदारुमांसीतगरचन्दनम् । शतपुष्पा बला कुष्ठमेला शैलेयमुत्पलम्।।136।। ऋद्धिर्मेदा च मधुकं काकोली जीवकस्तथा। एषां कर्षसमैः कल्कैस्तैलं गोमयवह्निना।।137।। पचेत् तेनैव तैलेन नरः स्त्रीषु वृषायते। नारी च लभ्यते पुत्रं योनिशूलं च नश्यति।।138।। अङ्गशूलं शिरःशूलं कामलां पाण्डुतां गरम्। गृध्रसीप्लीहशोषांश्च मेहान् दण्डपातानकम्।।139।। सदाहं वातरक्तं च वातपित्तगदार्दितम्। असृग्दरं तथाध्मानं रक्तपित्तं च नश्यति।।140।। शतावरीतैलमिदं कृष्णात्रेयेण भाषितम्। ॐ नारायण्यै स्वाहा। उत्तराभिमुखो भूत्वा खनेत् खदिरशंकुना।।141।। ॐ सर्वव्याधिनाशिन्यै स्वाहा। इत्युत्पाटनमन्त्रः। ॐ कुमारजीविन्यै स्वाहा। इति पाचनमन्त्रः। शतावर, बरियारा, अतिबला (कंघी), शालपर्णी, पिठवन, एरण्ड की जड़, असगन्ध, गोखरू, बेलगिरी, कास (काही) की जड़ तथा कटसरैया प्रत्येक द्रव्य को डेढ़-डेढ़ पल (6-6 तोला) लेकर भली-भाँति पीसकर सब द्रव्यों की अपेक्षा चौगुने (6-6 पल) जल में डालकर क्वाथ करें, जब चतुर्थांश शेष रह जाये तो क्वाथ को छानकर ले लें, फिर इस क्वाथ को एक प्रस्थ तिलतैल (64 तोला) में मिलाकर एक प्रस्थ (64 तोला) गाय का दूध मिला दें, शतावर का रस एक प्रस्थ (64 तोला), एक प्रस्थ (64 तोला) जल भी उसी में मिला दें और शतावर, देवदारु, जटामांसी, तगर, श्वेतचन्दन, सौंफ, बरियारा, कूठ, बड़ी इलायची, छड़ीला, कमल, ऋद्धि (अभाव में बाराहीकन्द), मेदा (अभाव में शतावर), मुलेठी, काकोली (अभाव में असगन्ध) तथा जीवक (अभाव में विदारीकन्द) प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला लेकर इनका कल्क बनाकर तैल में मिला दें, फिर इसका गोहरों का अग्नि से पाक करें। तैयार हो जाने पर छानकर रख लें। इस तैल को शिर पर लगाने से मनुष्य स्त्रियों में मैथुन-सामर्थ्य प्राप्त करता है, स्त्री पुत्र को प्राप्त करती है, उसका योनिशूल भी नष्ट हो जाता है। इस तैल के प्रयोग से अंगशूल, शिरःशूल, कामला (पीलिया), पाण्डुरोग, गरनामक विषविशेष, गृध्रसी, प्लीहाविकृति, शोष, प्रमेह, दण्डापातानक, दाहयुक्त वातरक्त, वात तथा पित्त के रोग, अर्दित (मुख का लकवा), आध्मान (अफारा) तथा रक्तपित्त नष्ट हो जाता है। इस तैल का नाम 'शतावरी तैल' है। यह महर्षि कृष्णात्रेय का कहा हुआ है। इस तैल का पाक करते समय 'ॐ नारायण्यै स्वाहा' इस मन्त्र का पाठ करना चाहिये। शतावरी को अथवा सभी औषधियों को उत्तर दिशा की ओर मुख करके खैर की लकड़ी के शंकु (कीले) से, (लोह आदि के शस्त्र का उपयोग नहीं करना चाहिये) 'ॐ सर्वव्याधिविनाशिन्यै स्वाहा' इस मन्त्र का जप करते हुये उखाड़ना चाहिये। इसे पीते समय 'ॐ कुमारजीविन्यै स्वाहा' इस मन्त्र का पाठ करना चाहिये। वक्तव्य—हमारा विचार है कि मन्त्रों का दिव्य प्रभाव औषधियों और उनके सेवकों पर पड़ता है। कहा भी है 'सिद्धवैद्यस्तु मान्त्रिकः' अर्थात् मन्त्र का ज्ञाता सिद्धवैद्य होता है। अनेक रोगों को मन्त्रों द्वारा अच्छा होते भी देखा ही जाता है।