शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 356 में से
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चतुर्थांशं शृतं नीत्वा मृद्भाण्डे सन्निधापयेत्। चतुःषष्टिपलां द्राक्षां पचेन्नीरे चतुर्गुणे ।। 87 ।। त्रिपादशेषं शीतं च पूर्वक्वाथे शृतं क्षिपेत्। द्वात्रिंशत्पलिकं क्षौद्रं दद्याद् गुडचतुःशतम् ।। 88 ।। त्रिंशत्पलानि धातक्याः कङ्कोलं जलचन्दनम्। जातीफलं लवङ्गं च त्वगेलापत्रकेशरम् ।। 89 ।। पिप्पली चेति सञ्चूर्ण्य भारङ्गिद्विपलिकैः पृथक्। शाणमात्रां च कस्तूरीं सर्वमेकत्र निक्षिपेत् ।। 90 ।। भूमौ निखातयेद् भाण्डं ततो जातरसं पिबेत्। कतकस्य फलं क्षिप्त्वा रसं निर्मलतां नयेत् ।। 91 ।। ग्रहणीमरुचिं श्वासं कासं गुल्मं भगन्दरम्। वातव्याधिं क्षयः छर्दिं पाण्डुरोगं च कामलाम् ।। 92 ।। कुष्ठान्यर्शांसि मेहांश्च मन्दाग्निमुदराणि च। शर्करामश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं धातुक्षयं जयेत् ।। 93 ।। कृशानां पुष्टिजननो वन्ध्यानां गर्भदः परः। अरिष्टो दशमूलाख्यस्तेजःशुक्रबलप्रदः ।। 94 ।। इति श्रीदामोदरसूनूना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे आसवारिष्टकल्पना नाम दशमोऽध्यायः ।। 10 ।।
शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कंटकारी, बनभण्टा, गोखरू, बेलगिरी, अरणी, टेण्टू, पाढल तथा गम्भार इन सम्मिलित दस द्रव्यों को 'दशमूल' कहा जाता है। उक्त दस द्रव्यों को पृथक्-पृथक् पाँच-पाँच पल (20-20 तोला) लें; चीता की जड़ 25 पल (1¼ सेर), आँवला 16 पल (64 तोला), धमासा 12 पल (48 तोला), खैरसार, विजयसार तथा हरड़ प्रत्येक आठ-आठ पल (32-32 तोला), कूठ, मजीठ, देवदारु, वायविडंग, मुलेठी, भारंगी, कैथ का फल, बहेड़ा, पुनर्नवा, चव्य, जटामांसी, फूलप्रियंगु, सारिवा, काला जीरा, निसोत, रेणुका, रास्ना, पिप्पली, सुपारी, कचूर, हल्दी, सौंफ, पद्माकाष्ठ, नागकेसर, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोंठ, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि तथा वृद्धि प्रत्येक द्रव्य दो-दो पल (8-8 तोला) लेकर सभी द्रव्यों को जौकुट करके आठ गुने जल में डालकर क्वाथ करें और चतुर्थांश अवशिष्ट रहने पर छानकर क्वाथ को मृत्तिकापात्र में डालकर रख दें और साठ पल (3 सेर) द्राक्षा (दाख) को चौगुने जल में पकायें, जब तीन भाग (9 सेर) शेष रह जाये तो ठंडा हो जाने पर पहले बनाये गये क्वाथ में डाल दें और मधु तीस पल (1 सेर 8 तोला), गुड़ चार सौ पल (20 सेर) डालकर भली प्रकार मिला दें। धाय के फूल 30 पल (1½ सेर), शीतलचीनी, नेत्रवाला, श्वेतचन्दन, जायफल, लौंग, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर तथा पीपल प्रत्येक द्रव्य दो-दो पल (8-8 तोला) लेकर उनका चूर्ण बनाकर तथा कस्तूरी एक शाण (4 आना भर) को पीसकर उक्त घोल में मिला दें और इस घोल को भूमि में गाढ़े हुये मिट्टी के पात्र में डाल दें और उसका मुख बन्द करके मिट्टी से ढक दें। एक मास के बाद जब तैयार हो जाये तो निर्मली के फलों का चूर्ण डालकर द्रव के निर्मल बना लें। यह अरिष्ट ग्रहणीरोग, अरुचि, श्वास, कास, गुल्म, भगन्दर, वातव्याधि, क्षयरोग, छर्दि (कै) रोग, पाण्डुरोग, कामलारोग, कुष्ठ, अर्श, प्रमेह, मन्दाग्नि, उदररोग, शर्करा (मूत्ररोग), अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र तथा धातुक्षय को जीतता है और कृशों को पुष्टि, वन्ध्याओं को गर्भ तथा सबको तेज, शुक्र तथा बल देता है। इसका नाम 'दशमूलारिष्ट' है।
वक्तव्य—उक्त अरिष्ट प्रसूति रोग एवं प्रसूता स्त्री के लिए उत्तम औषध है। निर्मली द्वारा दूसरे आसव, अरिष्टों को भी स्वच्छ कर लेना चाहिये। इसमें कस्तूरी भी डाली जाती है। इसका प्रयोग अपतन्त्रक (हिस्टीरिया) में भी किया जाता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का दसवाँ अध्याय समाप्त ।। 10 ।।