भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

एकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 175

जाये तो समान भाग सुवर्ण के पत्रों पर उसका लेप कर दें और कचनार की छाल का कल्क (चटनी) बनाकर उसकी दो मूषा (सिकोरा) बनाकर सुखा लें। फिर इनमें उक्त सुवर्ण- पत्रों के गोलक को दूसरे दो मिट्टी के सिकोरों में रखकर कपड़मिट्टी से भली-भाँति सन्धि-बन्ध करके सुखा लें और बबूल के कोयलों की तीव्र अग्नि में रखकर पुट दें, इसी प्रकार तीन पुटें देनी चाहिये। इस विधि से सुवर्ण की निरुत्थ भस्म बन जाती है। इसे सभी कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये।

चौथी विधि काञ्चनारप्रकारेण लाङ्गली हन्ति काञ्चनम्।।13।। ज्वालामुखी यथा हन्यात् तथा हन्ति मनःशिला। जिस प्रकार उपर्युक्त विधि से कचनार के संयोग से सुवर्ण की भस्म की जाती है, ठीक उसी विधि से लांगली (कलहारी) भी सुवर्ण को मारती है और उसी विधि से ज्वालामुखी द्वारा भी भस्म बनायी जाती है और उसी विधि से मैनसिल भी सुवर्ण को मारती (भस्म करती) है। वक्तव्य-आज ज्वालामुखी नामक औषधि का परिचय सन्देह में पड़ गया है। सुवर्णपत्रों पर उक्त द्रवों का लेप प्रथम बार ही किया जा सकता है। दूसरी, तीसरी बार में उन रसों के साथ ही पीसना पड़ता है।

पाँचवीं विधि शिलासिन्दूरयोश्चूर्णं समयोरर्कदुग्धकैः।।14।। सप्तैव भावना दद्याच्छोषयेच्च पुनः पुनः। ततस्तु गालिते हेमि कल्कोऽयं दीयते समः।।15।। पुनर्धमेदितरतां यथा कल्को विलीयते। एवं वेलात्रयं दद्यात् कल्कं हेममृतिर्भवेत्।।16।। समान भाग (4-4 तोला) मैनसिल तथा रससिन्दूर को आक के दूध की सात भावनायें देकर सुखा लें। इसके पश्चात् कड़छुल में सुवर्ण (4 तोला) गलाकर उसमें उपर्युक्त मैनसिल तथा रससिन्दूर का चूर्ण डाल दें। जब ये आपस में मिल जायें तो धौंकनी से अत्यन्त तीव्र अग्नि करके उस चूर्ण को विलीन कर दें। इसी प्रकार तीन बार चूर्ण को विलीन करने से सुवर्ण की भस्म तैयार हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से मैनसिल तो उड़ जाता है, किन्तु सिन्दूर जो कि सीसक-निर्मित पदार्थ है, नहीं उड़ता। अतः सुवर्ण में ही रह जाता है और तपाने से वह सीसक सुवर्ण भस्म से पृथक् हो जाता है और सुवर्ण भस्म पृथक् हो जाती है।

छठी विधि पारावतमलैर्लिम्पेदथवा कुक्कुटोद्भवैः। हेमपत्राणि तेषां च प्रदद्यादन्तरान्तरम्।।17।। गन्धचूर्ण समं दत्त्वा शरावयुग्मसम्पुटे। प्रदद्यात् कुक्कुटपुटं पञ्चभिर्गोमयोपलैः।।18।। एवं नवपुटान् दद्याद् दशमं च महापुटम्। त्रिंशद् वनोपलैर्देयं जायते हेमभस्मकम्।।19।। शुद्ध सुवर्ण के पत्रों पर कबूतर की अथवा मुरगा की बीट (जल में सानकर) का लेप करे और उनके बीच-बीच में सुवर्ण के समान भाग गन्धक का चूर्ण देकर तथा दो सिकोरों के सम्पुट में रखकर पाँच उपलों का कुक्कुट पुट दें और इसी प्रकार नौ पुटें दें और दसवीं महापुट तीस उपलों की देनी चाहिये। इस विधि से सुवर्ण की भस्म बन जाती है। वक्तव्य-कुक्कुटपुट का लक्षण-'वितस्तिमात्रे गर्त्ते यत् पुटयेत् तन्तु कौक्कुटम्। अर्थात् एक बालिस्त चौकोर गड्ढे में जो पुट दी जाती है उसे 'कुक्कुटपुट' कहा जाता है। और-'घने वेदास्त्रके गर्त्ते हस्ते द्वितयमात्रके। पुटं यद् दीयते प्राज्ञैस्तद्वि प्रोक्तं महापुटम्।।' अर्थात् दो हाथ गहरे तथा चौड़े चौकोर गड्ढे में जो पुट दी जाती है, उसे महापुट कहा जाता है।

सुवर्ण भस्म के गुण (सुवर्णं च भवेत् स्वादु तिक्तं स्निग्धं हिमं गुरु। बुद्धिविद्यास्मृतिकरं विषहारि रसायनम्।।20।।) सुवर्ण स्वादु (मधुर) है, अनुरस से तिक्त है, स्निग्ध, हिम (शीत), गुरु, बुद्धि, विद्या तथा स्मरणशक्ति को बढ़ाता है, विष को हरता है और रसायन है। वक्तव्य-सुवर्ण आकरों (खानों) एवं नदियों की बालू में से प्राप्त किया जाता है। इसके पत्र अन्य सभी धातुओं के पत्रों की अपेक्षा अधिक पतले बनाये जा सकते हैं। इसका गुरुत्व जल की अपेक्षा लगभग 19¼ गुना भारी है और इसका द्रवणांक 1064° से० है।

रजत भस्म की विधि भागैकं तालकं मर्द्यं याममम्लेन केनचित्। तेन भागतत्रयं तारपत्राणि परिलेपयेत्।।21।। धृत्वा मूषापुटे रुद्ध्वा पुटेत् त्रिंशद्वनोपलैः। समुद्धृत्य पुनस्तालं दत्त्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत्।।22।। एवं चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 211, कुल 356 में से · BharatKosha