शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें178 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे नाग भस्म ताम्बूलीरससम्पिष्टशिलालेपात् पुनः पुनः॥ ३६॥ द्वात्रिंशद्भिः पुटैर्नागो निरुत्थो याति भस्मताम्। बार-बार पान के रस से पीसी हुई तथा मैनसिल के संयोग से बत्तीस पुटें देने से नाग (सीसा) की निरुत्थ भस्म हो जाती है। वक्तव्य- प्रथम बार मैनसिल नाग के समान ही ली जाती है और फिर अष्टमांश। इस विधि से सीसा की भस्म आसमानी रंग की बनती है। इसको थोड़ी गोहरी की आँच देनी चाहिये, अन्यथा सीसा पिघलकर मण्डूर-सा बन जाता है। अन्त में इसे तौलकर देखिये, यदि तौल में कुछ भी बढ़ गया हो तो मैनसिल के बिना ही पान के अथवा अडूसा के रस में घोटकर तब तक पुटें देनी चाहिये जब तक तौल पूर्ववत् न हो जाये। नाग भस्म की विधि अश्वत्थचिञ्चात्वक् चूर्णं चतुर्थांशेन निक्षिपेत्॥ ३७॥ मृत्पात्रे द्राविते नागे लोहदर्व्या प्रचालयेत्। यामैकेन भवेद् भस्म तत्तुल्यां च मनःशिलाम्॥ ३८॥ काञ्जिकेन द्वयं पिष्ट्वा पचेद् दृढपुटेन च। स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा शिलया काञ्जिकेन च॥ ३९॥ पुनः पुटेच्छरावाभ्यामेवं षष्टिपुटैर्मृतिः। मिट्टी के पात्र में पिघलाये हुये सीसक में पीपल वृक्ष तथा इमली वृक्ष की छाल का चौथाई चूर्ण डालकर लोहे की कड़छुली से हिलाता रहे, एक पहर में वह सीसक भस्म जैसा हो जाता है। इसके बाद उसे खरल में डालकर और उसमें समान भाग मैनसिल डालकर काँजी के साथ पीसना चाहिये। बाद में उसे दो सिकोरों में बन्द करके पुट दें देनी चाहिये। स्वांग शीतल होने पर फिर से मैनसिल (अष्टमांश) डालकर काँजी से पीसकर पुट दे दें। इस प्रकार साठ पुटें देने से सीसक की भस्म तैयार हो जाती है। वक्तव्य- इसका गुरुत्व 11.3 है और द्रवणांक 328° से० है। यह प्रमेह की उत्तम औषध है। वंग भस्म की विधि मृत्पात्रे द्राविते वङ्गे चिञ्चाश्वत्थत्वचो रजः॥ ४०॥ क्षित्त्वा क्षित्त्वा चतुर्थांशमयोदर्ध्या प्रचालयेत्। ततो द्वियाममात्रेण वङ्गभस्म प्रजायते॥ ४१॥ अथ भस्मसमं तालं क्षिप्त्वाम्लेन प्रमर्दयेत्। ततो गजपुटे पक्त्वा पुनरम्लेन मर्दयेत्॥ ४२॥ तालेन दशमांशेन याममेकं ततः पुटेत्। एवं दशपुटैः पक्वो वङ्गस्तु म्रियते ध्रुवम्॥ ४३॥ मिट्टी के पात्र में पिघलाये हुये वंग (राँगा) में इमली तथा पीपल के वृक्ष की छाल का चतुर्थांश चूर्ण डालकर लोहे की कड़छुली से हिलाते रहें। इस प्रकार दो पहर (6 घंटे) में वंग भस्म-सा हो जाता है। इसके पश्चात् उसमें समान भाग हरिताल डालकर काँजी के साथ मर्दन करे और टिकिया बनाकर सुखाकर गजपुट में पुट दे दें। स्वांगशीतल हो जाने पर दशमांश हरिताल डालकर और काँजी से एक प्रहर-पर्यन्त पीसकर पुट दें। इसी प्रकार दस पुटों में पकाया गया वंग अवश्यमेव मर जाता है, अर्थात् उसकी भस्म हो जाती है। वक्तव्य- उक्त विधि से बनी हुई 'वंग भस्म' अत्यन्त गुणवान् होती है। यह भी प्रमेह की उत्तम औषधि है। विद्वानों का कथन है कि नाग को मैनसिल के योग से और वंग को हरिताल के योग से ही भस्म करना चाहिये। खानों में से वंग के मिश्रित स्फटिकाकार काले पत्थर मिलते हैं। इनको तपाकर वंग प्राप्त किया जाता है। वंग का गुरुत्व 12.4 तथा द्रवणांक 230° से० है। लोह भस्म की विधि शुद्धं लोहभवं चूर्णं पातालगरुडीरसैः। मर्दयित्वा पुटेद् वह्नौ दद्यादेवं पुटत्रयम्॥ ४४॥ पुटत्रयं कुमार्या च कुठारच्छिन्निकारसैः। पुटषट्कं ततो दद्यादेवं तीक्ष्णमृतिर्भवेत्॥ ४५॥ पूर्वोक्त विधि से शुद्ध किये हुये लोहचूर्ण (तीक्ष्णलोह अर्थात् फौलाद के चूर्ण) को पातालगारुडी (जलजमनी) के रस में पीसकर गजपुट द्वारा पुट दें, इसी तरह तीन पुट दें, घीकुआर के रस की तीन पुट दें, कुठेरक की छाल तथा गिलोय के रस की (तीन-तीन अर्थात्) छः पुटें दें। इसी तरह बारह पुटें देने से तीक्ष्णलोह की भस्म हो जाती है। दूसरी विधि क्षिपेद् वा द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णतः। मर्दयेत् कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत्॥ ४६॥ एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लोपचूर्णमवाप्नुयात्। रसैः कुठारछिन्नायाः पातालगरुडीरसैः॥ ४७॥ स्तन्येन चार्कदुग्धेन तीक्ष्णस्यैवं मृतिर्भवेत्। तीक्ष्णलोह (फौलाद) के चूर्ण की अपेक्षा द्वादशांश दरद (शिंगरफ) डालकर घीकुआर के रस में भली-भाँति दो प्रहर