शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसन्धिरोध कर दें। सूख जाने पर एक हाथ गहरे गड्ढे में अथवा गजपुटों में उपलों द्वारा पुट दे दें, स्वांगशीतल होने पर उसे निकाल लें। इसको पीसकर चार रत्ती की मात्रा लेकर घी मधु तथा उनतीस काली मीरच के चूर्ण के साथ मिलाकर दी जाती है। इसे चाँदी, मिट्टी, काँच अथवा सुवर्ण के पात्र (कटोरी) में मिलाकर चाटना चाहिये। इसके सेवन काल में स्वस्थचित्त होकर लोकनाथ रस के समान पथ्य करना चाहिये। यह 'हेमगर्भपोट्टली' कास, श्वास, क्षय, वातव्याधि, कफव्याधि, ग्रहणीरोग तथा अतिसार रोग में प्रयुक्त करनी चाहिये। वक्तव्य-मृगाङ्कपोट्टली तथा द्वितीय हेमगर्भपोट्टली नामक रसों का निर्माण-प्रकार प्रायः समान ही है। इनके विषय में एक बात विचारणीय यह है कि कुछ चिकित्सकों तथा धनिकों के यहाँ हेमगर्भपोट्टली या हिरण्यगर्भपोट्टली नामक रस शिवलिङ्गाकार या गुटिकाकार या बड़े बेर के समान आकृति वाले देखे जाते हैं। उनका घिसकर प्रयोग किया जाता है और वह 'पोटली' नाम भी प्रमाणित करता है कि वह गुटिकाकार हो, किन्तु 'पुटेद् गजपुटेन च' मृगाङ्कपोट्टली में और 'पुटेद् गजपुटेनैव' द्वितीय हेमगर्भपोट्टली में गजपुट देने का विधान किया है। इतनी अधिक आँच देने पर औषधि चूर्ण के आकार की प्राप्त होती है। अतः इसमें गजपुट न देकर इतनी पुट देनी चाहिये जिससे गन्धक पूर्णरूप से जीर्ण न होने पाये, केवल पिघलकर गुटिकाकार बन जाये, यदि कभी अधिक सन्ताप के कारण गन्धक जीर्ण भी हो जाये तो दुबारा गन्धक डालकर गोला बनाकर, कपड़ा लपेटकर, मिट्टी से लीपकर, मूषा-सम्पुट में रखकर, लवणयन्त्र में दबाकर मृदु पुट दें, ऐसा करने से पुनः पोटली तैयार हो जायेगी। गन्धक जीर्ण होने पर हो सकता है कि पारद भी उड़ जाये। इस दशा में पारद-गन्धक की कज्जली बनाकर मिलानी चाहिये। मृगाङ्कपोट्टली में पिसा हुआ मौक्तिक चूर्ण दिया जाता है। अतः उसका तौल भी एक तृतीयांश घट जाती है। द्वितीय ज्वरांकुश शुद्धसूतो विषं गन्धः प्रत्येकं शाणसम्मिताः। धूर्त्तबीजं त्रिशाणं स्यात् सर्वेभ्यो द्विगुणा भवेत् ।। 114 ।। हेमाह्वा कारयेदेषां सूक्ष्मं चूर्ण प्रयत्नतः । देयं जम्बीरमज्जाभिश्चूर्णं गुञ्जाद्वयोन्मितम् ।। 115 ।। आर्द्रकस्वरसैर्वापि ज्वरं हन्ति त्रिदोषजम्। एकाहिकं द्वयाहिकं वा त्र्याहिकं वा चतुर्थकम् ।। 116 ।। विषमं च ज्वरं हन्याद् विख्यातोऽयं ज्वराङ्कुशः। शुद्ध पारद, शुद्ध विष (मीठा तेलिया) तथा शुद्ध गन्धक प्रत्येक द्रव्य एक-एक शाण (4-4 आना भर), धत्तूर के बीज (शुद्ध) तीन शाण (12 आना भर) और सबसे दुगुना (1½ तोला) सत्यानाशी (चोक) लें। इन सबका सूक्ष्म चूर्ण बना लें। इसकी दो रत्ती की मात्रा जम्बीरी नींबू के बीजों की मज्जा (गिरी) के साथ अथवा अदरक के रस के साथ देनी चाहिये। यह त्रिदोषजनित ज्वर को नष्ट करता है और एकाहिक, द्व्याहिक, तृतीयक तथा चतुर्थक नामक विषम ज्वर को नष्ट करता है। यह औषध 'ज्वरांकुश' नाम से प्रसिद्ध है। धत्तूरबीज-शोधन-धत्तूर के बीजों को गोमूत्र में चार पहर तक भिगोकर, फिर उन्हें कूट कर छिलका उतार कर उसकी गिरी को योगों में प्रयुक्त करें। वक्तव्य-विष का शोधन इसी अध्याय के अन्त में देखें। सत्यानाशी अर्थात् बनभाण्ट की जड़ का नाम 'चोक' है। आवश्यकता पड़ने पर इसके जड़ की छाल लेनी चाहिये। आनन्दभैरव रस दरदं वत्सनाभं च मरिचं टङ्कणं कणाम् ।। 117 ।। चूर्णयेत् समभागेन रसो ह्यानन्दभैरवः । गुञ्जैकं वा द्विगुञ्जं वा बलं ज्ञात्वा प्रयोजयेत् ।। 118 ।। मधुना लेहयेच्चानु कुटजस्य फलं त्वचम्। चूर्णितं कर्षमात्रं तु त्रिदोषोत्थातिसारजित् ।। 119 ।। दध्यन्नं दापयेत् पथ्यं गवाज्यं तक्रमेव च। पिपासायां जलं शीतं विजया च हिता निशि ।। 120 ।। शुद्ध शिंगरफ, शुद्ध विष (वत्सनाभ), मरिच, भुना हुआ सोहागा तथा पीपल-इन सबको समान भाग में लेकर सूक्ष्म चूर्ण बना लें। इस रस का नाम 'आनन्दभैरव' है। इसकी एक अथवा दो रत्ती को मात्रा रोगी का बल देखकर प्रयुक्त करनी चाहिये और मधु के साथ चटानी चाहिये। अनुपान में कुरैया के फल अर्थात् इन्द्रजौ अथवा उसकी छाल का चूर्ण एक कर्ष (1 तोला) भर लेकर मधु के साथ देना चाहिये। यह रस त्रिदोषज अतिसार को जीतता है। पथ्य में दही भात और गाय अथवा बकरी का तक्र (मट्ठा) देना चाहिये। प्यास में शीतल जल और रात्रि में सोते समय भाँग का चूर्ण देना चाहिये। वक्तव्य-यह योग वैद्य समाज में प्रचलित सुप्रसिद्ध है। अनुपान-भेद से ज्वर आदि रोगों में भी प्रयुक्त किया जाता