शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 201
एरण्ड की जड़ का क्वाथ शुद्ध गूगल डालकर गरम-गरम पीयें। इससे अवश्य आरोग्य-लाभ होता है।
हंसपोट्टली रस
दग्ध्वा कपर्दिकान् पिष्ट्वा त्र्यूषणं टङ्कण विषम् । गन्धकं शुद्धसूतं च तुल्यं जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ 170 ॥ मर्दयेद् भक्षयेन्माषं मरिचाज्यं लिहेदनु । निहन्ति ग्रहणीरोगं पथ्यं तक्रौदनं हितम् ॥ 171 ॥
कौड़ियों को जलाकर पीस लें। इस कपर्दिकाभस्म तथा त्रिकटु, टंकण, शुद्धविष, शुद्धगन्धक, शुद्धपारद को समान भाग लेकर जम्बीरी नींबू के रस में मर्दन करें और एक माशा भर खायें। अनुपान में कालामिरच का चूर्ण तथा घृत मिलाकर चाट लें। यह औषध ग्रहणीरोग को नष्ट करती है। पथ्य में मट्ठा और भात हितकर होता है।
त्रिविक्रम रस
मृतं ताम्रमजाक्षीरैः पाच्यं तुल्यैर्गतद्रवम् । तत् ताम्रं शुद्धसूतं च गन्धकं च समं समम् ॥ 172 ॥ निर्गुण्डीस्वरसैर्मर्द्य तद्गोलं सन्ध्येद दिनम् । यामैकं बालुकायन्त्रे पाच्यं योज्यं द्विगुञ्जकम् ॥ 173 ॥ बीजपूरकमूलं तु सजलं चानुपाययेत् । रसस्त्रिविक्रमो नाम्ना मासैकैनाश्मरीप्रणुत् ॥ 174 ॥
ताम्रभस्म को समान भाग बकरी के दूध के साथ तब तक पकाना चाहिये जब तक दूध सूख न जाये। तत्पश्चात् उस ताम्रभस्म तथा शुद्ध पारद तथा शुद्ध गन्धक को समान भाग लेकर सम्भालू के पत्तों के स्वरस के साथ एक दिन तक मर्दन करे तदनन्तर गोला बनाकर और सम्पुट में रखकर बालुका-यन्त्र में एक पहर तक पाक करें। इस रस को दो रत्ती की मात्रा में सेवन करना चाहिये और अनुपान के लिए बिजौरा नींबू की जड़ जल में पीसकर देना चाहिये। यह 'त्रिविक्रम' नामक रस एक मास में अश्मरी को नष्ट करता है।
महातालेश्वर रस
तालं ताप्यं शिलां सूतं शुद्धं सैन्धवटङ्कणे । समांशं चूर्णयेत् खल्वे सूताद् द्विगुणगन्धकम् ॥ 175 ॥ गन्धतुल्यं मृतं ताम्रं जम्बीरैर्दिनपञ्चकम् । मर्द्यं षड्भिः पुटैः पाच्यं भूधरे सम्पुटोदरे ॥ 176 ॥ पुटे पुटे द्रवैर्मर्द्यं सर्वमेतत् तु षट्पलम् । द्विपलं मारितं ताम्रं लोहभस्म चतुष्पलम् ॥ 177 ॥ जम्बीराम्लेन तत्सर्वं दिनं मर्द्यं पुटेल्लघु । त्रिंशदंशं विषं चास्य क्षिप्त्वा सर्वं विचूर्णयेत् ॥ 178 ॥ माहिषाज्येन सम्मिश्रं निष्कार्धं भक्षयेत् सदा । मध्वाज्यैर्बाकुचीचूर्णं कर्षमात्रं लिहेदनु ॥ 179 ॥ सर्वकुष्ठानि हन्त्याशु महातालेश्वरो रसः ।
हरिताल, स्वर्णमाक्षिक, मैनसिल, शुद्ध पारद, सेंधा नमक तथा टंकण (चौकिया सुहागा) को समान भाग लेकर खरल में पीसना चाहिये, फिर पारद से दुगुनी शुद्ध गन्धक और गन्धक के समान भाग ताम्रभस्म मिलाकर जम्बीरी नींबू के रस के साथ पाँच दिन-पर्यन्त पीसना चाहिये तथा सम्पुट में रखकर 'भूधर-यन्त्र' में छः बार पाक करना चाहिये। प्रत्येक बार नींबू के रस के साथ पीसना चाहिये। इस प्रकार तैयार किया हुआ औषध 6 पल (24 तोला), ताम्र भस्म दो पल (8 तोला) तथा लोह भस्म चार पल (16 तोला) लेकर जम्बीरी नींबू के रस से एक दिन तक मर्दन कर लघु पुट दें, तत्पश्चात् इसमें तीसवाँ भाग शुद्ध विष (मीठा तेलिया) मिलाकर भली-भाँति पास लें। इसकी आधा निष्क (2 माशा) मात्रा लेकर भैंस के घी में मिलाकर प्रतिदिन खानी चाहिये और अनुपान में बाकुची का चूर्ण एक कर्ष (1 तोला) मधु तथा घृत में मिलाकर देना चाहिये। यह सब प्रकार के कुष्ठों को शीघ्र हा नष्ट करता है। इसका नाम 'महातालेश्वर' रस है।
कुष्ठकुठार रस
भस्मसूतसमो गन्धो मृतायस्ताम्रगुग्गुलून् ॥ 180 ॥ त्रिफला च महानिम्बश्वित्रकश्च शिलाजतु । इत्येतच्चूर्णितं कुर्यात् प्रत्येकं शाणषोडश ॥ 181 ॥ चतुःषष्टिः करञ्जस्य बीजचूर्णं प्रकल्पयेत् । चतुःषष्टिमृतं चाभ्रं मध्वाज्याभ्यां विलोडयेत् ॥ 182 ॥ स्निग्धभाण्डे घृतं खादेद् द्विनिष्कं सर्वकुष्ठनुत् । रसः कुष्ठकुठारोऽयं गलत्कुष्ठनिवारणः ॥ 183 ॥
पारद भस्म (मूर्च्छित पारद या रससिन्दूर) शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, ताम्रभस्म शुद्धगूगल, त्रिफला चूर्ण, महानिम्ब (बकायन) के बीज का गिरी तथा शिलाजीत प्रत्येक वस्तु सोलह-सोलह शाण (4-4 तोला), करञ्ज के बीजों का चूर्ण चौंसठ शाण (16 तोला) तथा अभ्रक भस्म चौंसठ शाण (16 तोला) लेकर मधु तथा घी में मिला दें और इसे स्निग्ध (चिकने) पात्र में रख दें। इसकी दो निष्क (8 माशा) मात्रा सब प्रकार के कुष्ठों को नष्ट करती है। इसका नाम 'कुष्ठकुठार' रस है। यह गलत्कुष्ठ को नष्ट करता है।