भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना २०३

[बायाँ स्तम्भ] कर तथा बालुकायन्त्र में रखकर मन्द-मन्द अग्नि द्वारा तीन दिन पर्यन्त स्वेदन करें। सर्वांगशीतल होने पर उसे निकालकर भली-भाँति पीस लें। उसमें शुद्ध विष एक पल (4 तोला) और पीपल का चूर्ण दो पल मिलाकर रख दें। इसका नाम 'सर्वेश्वररस' है। इसकी दो रत्ती की मात्रा मधु के साथ चाटनी चाहिये। यह सुप्तिकुष्ठ तथा मण्डलकुष्ठ को जीतता है। बाकुचि तथा देवदारु का चूर्ण एक तोला लेकर एरण्ड के तैल में मिलाकर चाटना चाहिये। यह सुखदायक अनुपान है। वक्तव्य- सुप्ति नामक कोई कुष्ठ नहीं है, अपितु यह कुष्ठ का पूर्वरूप है। प्रायः कुष्ठ-स्थल शून्य (स्पर्शज्ञान हीन) हो जाता है। त्वचा स्थित कुष्ठ का लक्षण भी त्वक्स्वाप है, उसे ही 'सुप्तिकुष्ठ' कहा जाता है। देखें-सु० नि० अ० 5।

स्वर्णक्षीरी रस हेमाह्वां पञ्चपलिकां क्षिप्त्वा तक्रघटे पचेत्। तक्रे जीर्णे समुद्धृत्य पुनः क्षीरघटे पचेत्।।२०१।। क्षीरे जीर्णे समुद्धृत्य क्षालयित्वा विशोषयेत्। तच्चूर्णं पञ्चपलिकं मरिचानां पलद्वयम्।।२०२।। पलैकं मूर्च्छितं सूतमेकीकृत्य तु भक्षयेत्। निष्कैकं सुप्तिकुष्ठार्तः स्वर्णक्षीरीरसो ह्ययम्।।२०३।। चोक (सत्यानाशी) की जड़ पाँच पल (20 तोला) लेकर और तक्र (मट्ठा से) पूर्ण घड़े में डालकर पकायें जब पूरा तक्र पक जाये अर्थात् खोया की भाँति गाढ़ा हो जाये तो निकाल कर दुग्धपूर्ण घट में पकाये, जब दूध भी पक जाये तो उसे निकालकर पात्र को धोकर सुखा लें। इस चोक का चूर्ण पाँच पल (20 तोला), मरिचचूर्ण दो पल तथा मूर्च्छित पारद (रससिन्दूर) एक पल-इन सभी को एक साथ मिलाकर एक निष्क (3 माशा या 4 आना भर) उचित अनुपान के साथ सुप्तिकुष्ठ से पीड़ित रोगी को खिलायें। यह 'स्वर्णक्षीरी रस' है।

मेहबद्ध रस भस्मसूतं मृतं कान्तं मुण्डभस्म शिलाजतु। शुद्धं ताप्यं शिलां व्योषं त्रिफलां कोलबीजकम्।।२०४।। कपित्थं रजनीचूर्णं भृङ्गराजेन भावयेत्। त्रिंशद् वारं विशोध्याथ मधुयुक्तं लिहेत् सदा।।२०५।। निष्कमात्रो हरेन्मेहान् मेहबद्धो रसो महान्। महानिम्बस्य बीजानि पिष्ट्वा षट्सम्मितानि च।।२०६।। पलतण्डुलतोयेन घृतनिष्कद्वयेन च। एकीकृत्य पिबेच्चानु हन्ति मेहं चिरन्तनम्।।२०७।।

[दायाँ स्तम्भ] पारदभस्म (रससिन्दूर), कान्तलोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध स्वर्णमाक्षिक, शुद्ध मैनसिल, अभ्रकभस्म, त्रिफलाचूर्ण, बेर का मींगी, कैथ का फल तथा हल्दी का चूर्ण, प्रत्येक द्रव्य को समान भाग में लेकर भाँगरा के रस की तीस बार भावना दें और सुखाकर मधु के साथ प्रतिदिन चाटना चाहिये। इसकी एक निष्क (4 आना भर) मात्रा प्रमेहों को हरती है। यह महान् (उत्तम) 'मेहबद्ध रस' है। बकायन के छः बीज पीसकर एक पल चावलों के जल (धोवन) तथा दो निष्क घृत के साथ मिलाकर अनुपान में देना चाहिये। यह पुराने प्रमेह को नष्ट करता है।

महावह्नि रस चतुःसूतस्य गन्धाष्टौ रजनी त्रिफला शिवा। प्रत्येकं च द्विभागं स्यात् त्रिवृज्जैपालचित्रकम्।।२०८।। प्रत्येकं च त्रिभागं स्यात् त्र्यूषणं दन्तिजीरके। प्रत्येक मष्टभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत्।।२०९।। जयन्तीस्नुक्पयोभृङ्गवह्निवातारितैलकैः। प्रत्येकेन क्रमाद् भाव्यं सप्तवारं पृथक्पृथक्।।२१०।। महावह्निरसो नाम निष्कमुष्णजलैः पिबेत्। विरेचनं भवेत् तेन तक्रभक्तं ससैन्धवम्।।२११।। दिनान्ते दापयेत् पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम्। सर्वोदरहरः प्रोक्तो मूढवातहरः परः।।२१२।। शुद्ध पारद चार भाग तथा शुद्ध गन्धक आठ भाग (दोनों का विधिपूर्वक कज्जली बना लें), हल्दी, त्रिफला तथा हरड़ प्रत्येक द्रव्य दो-दो भाग, निसोत, शुद्ध जैपाल तथा चीता प्रत्येक द्रव्य तीन-तीन भाग, त्रिकटु, दन्ती तथा सफेद जीरा (भुना हुआ) प्रत्येक आठ-आठ भाग सबको पीसकर एक साथ मिला दें और अरणी, सेहुण्ड का दूध, भाँगरा, चीता, एरण्ड का तैल, प्रत्येक द्रव्य को क्रम से पृथक्-पृथक् सात- सात बार भावना दें। यह 'महावह्नि' नामक रस है। इसकी एक निष्क (चार आना भर) की मात्रा उष्णजल के साथ पीनी चाहिये। इससे विरेचन (दस्त) होता है। दिन के अन्त में अर्थात् उचित रूप से विरेचन हो जाने पर सेंधा नमक मिलाकर तक्र तथा भात का पथ्य देना चाहिये, शीतल जल का सर्वथा परित्याग करना चाहिये। यह सभी प्रकार के उदर रोगों को हरता है और मूढ़वात या उदावर्त्त का उत्तम विनाशक है। वक्तव्य- एरण्ड तैल की सात भावनायें नहीं दी जा सकतीं, अतः औषध स्निग्ध होने भर ही उक्त तेल डालना चाहिये।