भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 356 में से

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उत्तरखण्डे प्रथमोऽध्यायः स्नेहपानविधिः स्नेह के भेद, उनके पान का समय स्नेहश्चतुर्विधः प्रोक्तो घृतं तैलं तथा वसा। मज्जा च तं पिबेन्मर्त्यः किञ्चिदभ्युदिते रवौ ।। 1 ।। स्नेह चार प्रकार का कहा जाता है। यथा-1. घृत, 2 तैल, 3. वसा (मांसगत स्नेह) और 4. मज्जा (अस्थिगत स्नेह)। मनुष्य इस स्नेह को कुछ सूर्योदय होने पर पीये। वक्तव्य-उक्त श्लोक द्वारा किया गया स्नेहपान का समय-विधान सामान्य है। विशिष्ट विधान इसी अध्याय के सोलहवें श्लोक में दिया गया है। स्नेहपान-विधि-जब किसी रोगी अथवा नीरोग प्राणी को शोधन अर्थात् वमन-विरेचन आदि का प्रयोग करना होता है तो सर्वप्रथम स्नेहन तथा स्पंदन का प्रयोग कराया जाता है, अन्यथा लाभ के स्थान में हानि हो सकती है। ध्यान दें- 'स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम्। स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधन मथेतरत्'।। (च० सू० अ० 13.99)। और भी- 'स्नेहसारोऽयं पुरुषः, प्राणाश्च स्नेहभूयिष्ठाः स्नेहसाध्याश्च भवन्ति'। तथा-'स्नेहो हि पानानुवासनमस्तिष्कशिरो वस्ति, नस्य, कर्णपूरण, गात्राभ्यङ्ग, भोजनेषु उपयुज्यते'। (सु० चि० अ० 31)। स्नेह की दो योनियाँ स्थावरो जङ्गमश्चैव द्वियोनिः स्नेह उच्यते। तिलतैलं स्थावरेषु जङ्गमेषु घृतं वरम्।। 2 ।। स्नेह की योनि अर्थात् उत्पत्तिस्थान दो हैं-1. स्थावर तथा 2. जंगम। स्थावरों में उत्तम स्नेह तिलतैल है और जंगमों का उत्तम स्नेह घृत है। वक्तव्य-संसार के समस्त द्रव्य स्थावर, जंगम भेद से दो भागों में विभक्त हैं। यथा-1. स्थावर, इनसे तेल नामक स्नेह प्राप्त होता है। यथा-तिल, सरसों, तीसी, बादाम, पिस्ता, कद्दू, ककड़ी तथा खीरा आदि के बीजों का स्नेह जो कि कोल्हू आदि यन्त्रों द्वारा प्राप्त किया जाता है। 2. जङ्गम-मनुष्य, गाय, भैंस, बकरी, पक्षी तथा मछली आदि इनसे वसा, मज्जा तथा घृत प्राप्त होता है। इस प्रकार स्थावर तथा जङ्गम दो प्रकार के पदार्थों से उपलब्ध होने के कारण स्नेह को 'द्वियोनि' कहा जाता है। संस्कार के अनुसार कार्य करने के कारण तिलतैल तथा घृत को उत्तम माना जाता है। वैसे तो सभी प्रकार के स्नेह अपनी अपना विशेषता रखते ही हैं। मिलित स्नेहों के नाम द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिस्तैर्यमकस्त्रिवृतो महान्। मिलाये गये दो स्नेहों का नाम 'यमक', तीन स्नेहों का नाम 'त्रिवृत्' एवं चार स्नेहों का नाम 'महान्' है। स्नेह-सेवन की कालावधि पिबेत् त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहं तथा।। 3 ।। सप्तरात्रात् परं स्नेहः सात्म्यीभवति सेवितः। तीन, चार, पाँच अथवा छः दिन तक निरन्तर स्नेह का सेवन किया जा सकता है और सात दिन के पश्चात् सेवन किया हुआ स्नेह सात्म्य (अनुकूल) हो जाता है। वक्तव्य-कोष्ठ की मृदुता तथा क्रूरता के अनुसार उक्त दिनों तक स्नेहपान करना चाहिये, इसके पश्चात् जब स्नेह सात्म्य हो जाता है, तो उसमें मलों को उभाड़ने की शक्ति नहीं रह जाती। ('सात्म्यीभूतो हि कुरुते न मलानामुदीरणम्')। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

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