भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः] स्नेहपानविधिः 213 वसापान के योग्य व्यक्ति व्यायामकर्षिताः शुष्करेतोरक्ता महारुजः ।। 14 ।। महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः । जो मनुष्य मात्रा से अधिक व्यायाम करने के कारण कृश (दुबले) हो गये हों, जिनका शुक्र तथा रक्त सूख गया हो, जो महाव्याधियों (अर्श, भगन्दर आदि) से पीड़ित हों और जिनका जठराग्नि, बल, वायु तथा प्राण (जीवनीय शक्ति) बढ़ी हुई हो, वे मनुष्य 'वसा' पान के योग्य माने जाते हैं। मज्जापान के योग्य व्यक्ति क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्ता दीप्तवह्नयः ।। 15 ।। मज्जानं च पिबेयुस्ते सर्पिर्वा सर्वतो हितम् । जिनका आशय (कोष्ठ), क्रूर (कड़ा) हो, जो अधिक से अधिक क्लेश (कष्ट) को सहने के अभ्यासी हों, जो वातव्याधि से पीड़ित हों और जिनकी अग्नि दीप्त हो वे मज्जा पान करें, अथवा उनके लिए घृत सबसे हितकर होता है। वक्तव्य-उक्त श्लोक सुश्रुत चिकित्सास्थान अध्याय 31 के हैं। उक्त प्रसंग में 'सर्पिर्वा सर्वतो हितम्' के स्थान पर 'सर्पिर्वा स्वौषधान्वितम्' पाठ है जो अधिक उपयुक्त है। स्नेहपान का काल शीतकाले दिवा स्नेहमुष्णकाले पिबेन्निशि ।। 16 ।। वातपित्ताधिके रात्रौ वातश्लेष्माधिके दिवा । शितकाल में दिन में तथा उष्णकाल में रात्रि में स्नेहपान करना चाहिये। वातपित्त की अधिकता में रात्रि में तथा वातकफ की अधिकता में दिन में स्नेहपान करना उचित है। घृत तैल की उपयोग-विधि नस्याभ्यञ्जनगण्डूषमूर्धकर्णाक्षितर्पणैः ।। 17 ।। तैलं घृतं वा युञ्जीत दृष्ट्वा दोषबलाबलम् । नस्य (नासा द्वारा औषध-सेवन) में, अभ्यञ्जन (मालिश) में, गण्डूष में, शिर, कान तथा आँख के तर्पण में वातादि दोषों के बलाबल (वृद्धि-ह्रास) को देखकर तैल अथवा घृत का प्रयोग करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त कार्यों में वसा तथा मज्जा का भी प्रयोग किया जा सकता है और करते भी हैं। यथा-शेर और सूअर की चर्बी का अभ्यंग पार्श्वशूल आदि में किया ही जाता है। स्नेहों के अनुपान घृते कोष्णं जलं पेयं तैले यूषः प्रशस्यते ।। 18 ।। वसामज्जोः पिबेन्मण्डमनुपानं सुखावहम। घृत का अनुपान कोष्ण (गुनगुना) जल तथा तैल का अनुपान यूष (मूँग आदि की दाल का पानी) प्रशस्त (उत्तम) है। वसा तथा मज्जा का अनुपान माँड़ सुखदायक होता है। स्नेह-सेवन स्नेहद्विषः शिशून् वृद्धान् सुकुमारान् कृशानपि ।। 19 ।। उष्णकामानुष्णकाले सह भक्तेन पाययेत् । स्नेहपान के द्वेषियों (जो स्नेहपान करना नहीं चाहते) को, बालकों को, बूढ़ों को, सुकुमारों को, कृशों को तथा उष्णता (गर्मी) चाहने वालों को और उष्णकाल में भोजन या भात के साथ मिलाकर स्नेहपान कराना चाहिये। वक्तव्य-यहाँ 'उष्णकामान्' पाठ सर्वथा असंगत प्रतीत होता है, इसके स्थान में 'तृष्णाकुलान्' पाठ होना चाहिये, जो कि सर्वथा संगत है। देखें-सु० चि० अ० 31 श्लोक 37 । यह सम्पूर्ण श्लोक वहीं से उद्धृत किया गया है। यवागू से स्नेह-सेवन सर्पिष्मती बहुतिला यवागूः स्वल्पतण्डुला ।। 20 ।। सुखोष्णा सेव्यमाना तु सद्यः स्नेहनकारिणी । अधिक घृत से युक्त; अधिक तिल तथा थोड़े से चावलों से बनायी हुई 'यवागू' सुखोष्ण (गर्म-गर्म) सेवन की गयी शीघ्र स्नेहन करती है। वक्तव्य-उक्त पद्य में 'बहुतिला' के स्थान पर 'पयः सिद्धा' पाठ है। देखे- सु० चि० अ० 31 श्लोक 40 । दूध 1 सेर तथा चावल 1 छटांक की 'यवागू' (खीर) बनायें और घी डालकर गर्म-गर्म खा लें। मृदुकोष्ठ वाले रोगियों को इसी से विरेचन हो जाता है। धारोष्णदुग्ध से स्नेह-पान शर्कराचूर्णं सङ्घृष्टे दोहनस्थे घृते तु गाम् ।। 21 ।। दुग्ध्वा क्षीरं पिबेदुष्णं सद्यःस्नेहनमुच्यते । पिसी हुई चीनी के साथ मिश्रित घी को दूध दुहने के पात्र में रखकर उसमें गाय को दुहकर गर्म-गर्म पी लेने से शीघ्र स्नेहन हो जाता है। वक्तव्य-उपर्युक्त पद्य में 'सङ्घृष्टे' के स्थान में 'संसृष्टे' होना चाहिये। देखें-सु० चि० अ० 31 श्लोक 41 । स्नेहाजीर्ण की चिकित्सा मिथ्याचाराद् बहुत्वान्द्वा यस्य स्नेहो न जीर्यति ।। 22 ।। विष्टभ्य वापि जीर्येत वारिणोष्णेन वामयेत् । मिथ्याचार (अनुचित आहार-विहार) से अथवा मात्रा में अधिक हो जाने से जिसका स्नेह न पचे अथवा विष्टम्भ