शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः] विरेचनविधिः 229
वक्तव्य-उक्त लक्षण देखने पर समझ लेना चाहिये कि विरेचन भली-भाँति हो गया है, क्योंकि विरेचन का अतियोग हानिकर होता है। अतः अवशिष्ट दोष को शान्त करने के लिए पाचन का विधान किया गया है।
विरेचन से लाभ इन्द्रियाणां बलं बुद्धेः प्रसादो वह्निदीपनम्। धातुस्थैर्यं वयःस्थैर्यं भवेद् रेचनसेवनात् ॥४६॥ विधिपूर्वक 'विरेचन' का सेवन करने से इन्द्रियों का बल बढ़ता है। बुद्धि का प्रसाद (उन्मादादि रोगों का विनाश) होता है, अग्नि दीप्त होती है, धातुएँ स्थिर हो जाती हैं, और आयु का ह्रास नहीं होता है।
विरेचन में परिहार्य प्रवातसेवाशीताम्बुस्नेहाभ्यङ्गमजीर्णताम् । व्यायामं मैथुनं चैव न सेवेत् विरेचितः ॥४७॥
विरेचित (जिसको विरेचन दिया गया है) मनुष्य प्रवात (प्रचण्ड वायु या आँधी) का सेवन, शीतल, जल, स्नेह (तैल आदि) की मालिश, अजीर्ण (अपच), व्यायाम तथा मैथुन का सेवन न करें।
विरेचन में पथ्य शालिषष्टिकमुद्गाद्यैर्यवागूं भोजयेत् कृताम्। जाङ्गलविष्किराणां वा रसैः शाल्योदनं हितम् ॥४८॥ इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे विरेचनविधिः नाम चतुर्थोऽध्यायः
शाली चावल (वासमती), साठी चावल आदि की 'यवागू' (खीर जैसी पतली खिचड़ी) छौंक लगाकर खिलानी चाहिये अथवा शाली चावलों का भात जाङ्गल (हरिण आदि) तथा विष्किर (मुर्गा आदि) प्राणियों के मांसरस के साथ भी लाभदायक होता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का चौथा अध्याय समाप्त ।। ४ ।।
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