भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

पञ्चमोऽध्यायः ] स्नेहवस्तिविधिः 231 अनुवासन के योग्य रोगी अनुवास्यस्तु रूक्षः स्यात् तीक्ष्णाग्निः केवलानिती ।। 5 ।। रूक्ष (जिसके शरीर में रूक्षता हो), तीक्ष्ण अग्नि वाले तथा केवल वायु के रोगों से पीड़ित मनुष्य को 'अनुवासन- वस्ति' देनी चाहिये। अनुवासन के अयोग्य रोगी नानुवास्यस्तु कुष्ठी स्यान्मेही स्थूलस्तथोदरी। नास्थाप्या नानुवास्याश्चाजीर्णोन्मादतॄडर्दिताः ।। 6 ।। शोकमूर्च्छारुचिभयश्वासकासक्षयातुराः । कुष्ठी (कोढ़ी), प्रमेह रोगी, स्थूल (मोटा) तथा उदररोगी को 'अनुवासन' वस्ति नहीं देनी चाहिये। अजीर्ण, उन्माद तृष्णा, शोक, मूर्च्छा, अरुचि, भय, श्वास, कास तथा क्षयरोग से पीड़ित मनुष्यों को न आस्थापान (निरूहण) वस्ति देनी चाहिये और न अनुवासनवस्ति। वक्तव्य-यद्यपि उक्त पाठ में मूर्च्छित रोगी को अनुवासन तथा आस्थापान वस्ति देने का निषेध किया गया है, किन्तु स्वयं शार्ङ्गधराचार्य ने अग्रिम छठे अध्याय के 8वें श्लोक में मूर्च्छित को निरूहणवस्ति देने का विधान भी किया है। वस्ति-नेत्र के द्रव्य नेत्रं कार्यं सुवर्णादिधातुभिर्वृक्षवेणुभिः ।। 7 ।। नलैर्दन्तैर्विषाणाग्रैर्मणिभिर्वा विधीयते। वस्ति का नेत्र (नलिका) सुवर्ण आदि धातुओं, लकड़ी, बाँस, नल, दन्त (हाथीदाँत) का, सींग अथवा मणि का बनाया जाता है। वक्तव्य-यही नेत्र या नलिका एक ओर से गुद आदि में प्रविष्ट की जाती है और इसके दूसरे सिरे पर वस्ति (थैली) बाँध दी जाती है। वयस्-भेद से नेत्र-परिमाण एकवर्षात् षड्वर्षं यावन्मानं षडङ्गुलम् ।। 8 ।। ततो द्वादशकं यावन्मानं स्यादष्टसम्मितम्। ततः परं द्वादशभिरङ्गुलैर्नेत्रदीर्घता ।। 9 ।। इस नेत्र की लम्बाई रोगी की एक वर्ष से छः वर्ष की अवस्था तक छः अङ्गुल, छः से बारह वर्ष तक आठ अङ्गुल और इसके पश्चात् बारह अङ्गुल होनी चाहिये। वस्ति-नेत्र का छिद्र तथा आकार मुद्गच्छिद्रं कलायाभं छिद्रं कोलास्थिसन्निभम्। यथासङ्ख्यं भवेन्नेत्रं श्लक्ष्णं गोपुच्छसन्निभम् ।। 10 ।। इस नेत्र (नलिका) का छिद्र यथासंख्या अर्थात् छः, आठ तथा बारह अङ्गुल की नलिका में मूँग, मटर तथा बेर (झरबेरी का फल) की गुठली के (प्रविष्ट होने योग्य) होना चाहिये। यह नेत्र श्लक्ष्ण (साफ हो और खुरदरा न हो) तथा गाय की पूँछ के समान (आगे से पतला और मूल में मोटा) होना चाहिये। वस्ति-नेत्र का परिणाह आतुराङ्गुष्ठमानेन मूले स्थूलं विधीयते। कनिष्ठिकापरीणाहमग्रे च गुटिकामुखम् ।। 11 ।। यह नेत्र मूल में रोगी के अँगूठे के समान और अग्रभाग में कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटा होना चाहिये और इसका अग्रभाग गुटिका जैसा होना चाहिये। वस्ति-नेत्र की कर्णिका तन्मूले कर्णिके द्वे च कार्ये भागाच्चतुर्थकात्। योजयेत् तत्र बस्तिं च बन्धद्वयविधानतः ।। 12 ।। इस नेत्र के मूल की ओर चौथाई भाग छोड़कर (6 अंगुल की नलिका में 2 अंगुल छोड़कर) दो कर्णिका (अँगूठी जैसी) बनानी चाहिये और इन्हीं कर्णिकाओं पर वस्ति चढ़ाकर दो जगह बन्धन बाँध देने चाहिये। वक्तव्य-यह पाठ चरक तथा सुश्रुत के विरुद्ध होने के कारण भ्रान्त जैसा प्रतीत होता है। क्योंकि 'स्यात् कर्णिकैका- ऽग्रचतुर्थभागे मूलाश्रिते वस्तिनिबन्धने द्वे'। (च०सि० अ० 3 श्लोक 10)। इसमें 'अग्रे त्र्यंगुल' और जोड़ लें। वस्ति के योग्य द्रव्य मृगाजशूकरगवां महिषस्यापि वा भवेत्। मूत्रकोषस्य वस्तिस्तु तदलाभेन चर्मजः ।। 13 ।। कषायरक्तः सुमुदुर्बस्तिः स्निग्धो दृढो हितः। हरिण, बकरा, सूअर, गाय, भैंस, के मूत्रकोश या मूत्राशय की वस्ति होनी चाहिये। इनके अभाव में (यदि मूत्रकोश न मिले तो) चमड़े की भी बनायी जा सकती है और यह वस्ति कषाय रस वाले द्रव्यों (बबूल की छाल आदि) द्वारा रंगी हुई, सुकोमल, चिकनी तथा दृढ़ (मजबूत) होनी चाहिये। वक्तव्य-आजकल बाजार में रबर की वस्ति बनी-बनायी मिलती है, जो इसी प्रमाण से बनी हुई होती है। व्रणवस्ति का नेत्र व्रणवस्तेस्तु नेत्रं स्याच्छ्लक्ष्णमष्टाङ्गुलोन्मितम् ।। 14 ।। मुद्गच्छिद्रं गृध्रपक्षनलिकापरिणाहि च।