शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 271, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः ] स्नेहवस्तिविधिः 235 स्नेह के न लौटने पर उपाय अनायातं त्वहोरात्रे स्नेहं संशोधनैर्हरेत् ।। 46 ।। स्नेहबस्तावनायाते नान्यः स्नेहो विधीयते। दिन-रात तक (24 घंटे) में यदि स्नेह न निकले तो उसे (दूसरे दिन) संशोधन (निरूहण अथवा फलवर्ति) द्वारा निकाल देना चाहिये, क्योंकि स्नेह के न निकलने पर दुबारा स्नेह देना उचित नहीं है। वक्तव्य—अनुवासन के पश्चात् निरूहण और निरूहण के पश्चात् अनुवासन का प्रयोग करना उचित तथा आवश्यक होता है। इसी अध्याय में ऊपर 35 से 38 तक के श्लोकों द्वारा कहा गया विषय भी इससे प्रमाणित होता है। स्नेह-वस्ति के लिए गुडूच्यादि तैल गुडूच्येरण्डपूतीकभार्ङ्गीवृषकरोहिषम् ।। 47 ।। शतावरीं सहचरं काकनासां पलोन्मिताम्। यवमाषातसीकोलकुलत्थान् प्रसृतोन्मितान् ।। 48 ।। चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा द्रोणशेषेण तेन च। पचेत् तैलाढकं पेष्यैर्जीवनीयैः पलोन्मितैः ।। 49 ।। अनुवासनमेतद्धि सर्ववातविकारनुत्। गिलोय, एरण्ड की जड़, पूतिकरञ्ज (डिठोरी) को छाल, भारंगी, अडूसा, रोहिषतृण, शतावर, कटसरैया तथा कौवाठोठी प्रत्येक द्रव्य एक-एक (4-4 तोला), जौ, उड़द, अलसी, बेर तथा कुलथी प्रत्येक द्रव्य एक-एक प्रसृत (8-8 तोला) लेकर कूट लें, फिर इन सबको चार द्रोण (51 से 16 तोला) जल में डालकर क्वाथ करें और एक द्रोण (12 सेर 64 तोला) शेष रहने पर छानकर ले लें, इसको एक आढक (3 सेर 16 तोला) तिलतैल में डाल दें तथा जीवनीयगण (देखें शा०सं०, म०खं०अ० 6) के द्रव्यो को एक-एक पल (4-4 तोला) लकर उनका कल्क बनाकर उसी तैल में डाल दें उसके बाद विधिपूर्वक पाक करें। इस तैल द्वारा दिया गया 'अनुवासन' सभी प्रकार के वातविकारों को नष्ट करता है। वक्तव्य—इस तेल के अभाव में नारायण तैल आदि दूसरे तैल अथवा एरण्ड तैल का भी अनुवासन दिया जा सकता है, जो लाभकर होता है। स्नेहपानादि उपचार—स्नेहपान, वमन, विरेचन, रक्तस्राव, तथा निरूहणवस्ति पश्चात् मनुष्य की कायाग्नि (जठराग्नि) मन्द हो जाती है, वह अल्प मात्रा वाले या लघु (हल्के) आहारों के उपयोग से उसी प्रकार बढ़ती है, जिस प्रकार लकड़ी के पतले या हल्के टुकड़ों के उपयोग से अग्नि बढ़ती है। तात्पर्य यह है कि स्नेहपानादि क्रियाओं के पश्चात् थोड़ा तथा हल्का भोजन करना चाहिये, क्योंकि अग्नि के ठीक रहने पर मनुष्य चिरकाल तक जीता है और उसके बिगड़ने पर वह रोगी हो जाते हैं या वह मर जाता है। इसलिये अग्नि ही बल कहा जाता है। धान्यशुण्ठी क्वाथ—जिसे स्नेहवस्ति दी गयी है, उसे दूसरे दिन प्रातःकाल धनियां तथा सौंठ से सिद्ध किया हुआ उष्ण जल पीने को देना चाहिये। इससे उसकी अग्नि दीप्त होती है और भोजन की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। वस्ति-फलश्रुति—जैसे मूल में सींचने से वृक्ष हरा-भरा हो जाता है, वैसे ही 'वस्ति' का प्रयोग करने से मनुष्य कान्तिमान् तथा बलवान् हो जाता है। वस्ति-सेवनक्रम—अकेली स्नेहवस्ति अथवा निरूहवस्ति का ही अत्यन्त सेवन नहीं करना चाहिये, क्योंकि स्नेहवस्ति के अति सेवन से मन्दाग्नि तथा उत्क्लेश (जी मिचलाना) हो सकता है और निरूहणवस्ति के अति सेवन से वायु के कोप होने का भय रहता है। अतः जिसे निरूहण दिया गया है, उसे अनुवासन करना चाहिये और जिसे अनुवासन दिया गया है, उसे निरूहण करना चाहिये। ऐसा करने से पित्त तथा कफ का कोप भी नहीं होता और वायु के कोप का भय भी नहीं रहता। वस्ति-व्यापत्तियाँ षट्सप्ततिव्यापदस्तु जायन्ते वस्तिकर्मणा ।। 50 ।। दूषितात् समुदायेन ताश्चिकित्स्यास्तु सुश्रुतात्। दूषित (विकृत) वस्तिकर्मों के कारण 76 प्रकार की व्यापत्तियाँ हो सकती हैं। उनकी चिकित्सा आचार्य सुश्रुत के कथनानुसार करनी चाहिये। वक्तव्य—शास्त्रोक्त विधि का ध्यान न देकर जो वस्तिकर्म किया जाता है, उससे कुछ हानियाँ भी हो सकती हैं। उनका विशिष्ट परिज्ञान सुश्रुत चिकित्सास्थान अध्याय 35 तथा 36 के अध्ययन से प्राप्त करें। पथ्यापथ्य-निर्देश पानाहारविहाराश्च परिहाराश्च कृत्स्नशः ।। 51 ।। स्नेहपानसमाः कार्या नात्र कार्या विचारणा। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे स्नेहवस्तिविधिः नाम पञ्चमोऽध्यायः ।। 5 ।। अनुवासन वस्ति में पान, आहार, विहार तथा परिहार