भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 356 में से

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246 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे अथवा तीक्ष्ण द्रव्यों के साथ सिद्ध किये हुये स्नेहों, क्वाथों तथा रसों के प्रयोग से दिया जाता है। **वक्तव्य—**विरेचन नस्य से छीकें आती हैं। नाक, मुख तथा आँखों से जल एवं कफ भी निकलता है। विरेचन-नस्य की मात्रा नासिकारन्ध्रयोरष्टौ षट् चत्वारश्च बिन्दवः॥८॥ प्रत्येकं रेचने योज्या मुख्यमध्यान्त्यमात्रया। नासिका के प्रत्येक रन्ध्र (नथुने) में आठ, छः तथा चार बिन्दुओं (बूँदों) का प्रयोग रेचन नस्य की क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा अन्तिम (अधम) मात्रा है। नस्य के लिए द्रव्यों का परिमाण नस्यकर्मणि दातव्यं शाणैकं तीक्ष्णमौषधम्॥९॥ हिङ्गु स्याद्यवमात्रं तु माषैकं सैन्धवं मतम्। क्षीरं चैवाष्टशाणं स्यात् पानीयं च त्रिकार्षिकम्॥१०॥ कार्षिकं मधुरं द्रव्यं नस्यकर्मणि योजयेत्। नस्य के लिए जब औषध योग प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें तीक्ष्ण औषध (त्रिकटु तथा कट्फल आदि) एक शाण (1 धर), हींग जौ भर, सेंधा नमक एक माशा, दूध आठ शाण (2 तोला), नल तीन तोला तथा मधुर द्रव्य (खाँड तथा मधु आदि) एक तोला की मात्रा में मिलाकर इस घोल को नस्य-कर्म में प्रयुक्त करना चाहिये। विरेचन-नस्य के दो भेद अवपीडः प्रधमनं द्वौ भेदावपरौ स्मृतौ॥११॥ शिरोविरेचनस्यात्र तौ तु देयौ यथायथम्। शिरोविरेचन-नस्य के दो भेद और माने जाते हैं—

  1. अवपीड तथा 2. प्रधमन। इनका आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाता है। अवपीड, प्रधमन का स्वरूप कल्कीकृतादौषधाद्यः पीडितो निःस्रुतो रसः॥१२॥ सोऽवपीडः समुद्दिष्टस्तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः। षडङ्गुला द्विवक्त्रा या नाडी चूर्णं तया धमेत्॥१३॥ तीक्ष्णं कोलमितं वक्त्रवातैः प्रधमनं हि तत्। औषध का कल्क बनाकर उसको निचोड़ कर जो रस निकाला जाता है, उससे जो नस्य ली जाती है, उसे ‘अवपीड’ कहा जाता है। तीक्ष्ण द्रव्यों (त्रिकटु तथा कट्फल आदि) का बारीक चूर्ण एक कोल भर लेकर छः अंगुल लम्बी तथा दोनों ओर मुख वाली नलिका में डालकर नाक के भीतर मुख की वायु से फूँक दे, इसको ‘प्रधमन-नस्य’ कहा जाता है। **वक्तव्य—**किसी भी तीक्ष्ण द्रव्य की कोल भर की मात्रा बहुत अधिक होती है, अतः सुश्रुतोक्त वचनों पर ध्यान देकर कार्य करना उचित है—‘नाडी षडङ्गुलायामा द्विमुखी च तया धमेत्। त्रिश्चूर्णमुच्चुटीमात्रमेष प्रधमने विधिः॥ शुक्तिप्रमाणं जिघ्रेद् वा बद्धं सूक्ष्मेण वाससा’। देखें—सु० चि० अ० 40 सूत्र 46। चुटकी भर चूर्ण को अथवा शुक्ति भर चूर्ण को अत्यन्त बारीक वस्त्र में बाँधकर सूँघना चाहिये। विरेचन-नस्य के योग्य रोग ऊर्ध्वजत्रुगते रोगे कफजे स्वरसङ्क्षये॥१४॥ अरोचके प्रतिश्याये शिरःशूले च पीनसे। शोफाऽपस्मारकुष्ठेषु नस्यं वैरेचनं हितम्॥१५॥ ऊर्ध्वजत्रु (Collar bone) प्रदेश में स्थित रोगों, कफज स्वरभेद, अरुचि, प्रतिश्याय, शिरोरोग, पीनस, शोथ, अपस्मार तथा कुष्ठरोग में विरेचन-नस्य लाभदायक होती है। स्नेहन-नस्य भीरुस्त्रीकृशबालानां नस्यं स्नेहेन दीयते। भीरु (डरपोक), स्त्री कृश तथा बालक को स्नेह (तीक्ष्ण द्रव्यों से परिपक्व) की नस्य देनी चाहिये, यही इनके लिये उत्तम होती है। अवपीड-नस्य के योग्य रोगी गलरोगे सन्निपाते निद्रायां विषमज्वरे॥१६॥ मनोविकारे कृमिषु युज्यते चावपीडनम्। गलरोगों, सन्निपात, नींद की अधिकता, विषमज्वर, मानसिक रोगों तथा शिर के क्रिमिरोग में ‘अवपीड’ नस्य प्रयुक्त की जाती है। इसी को शिरोविरेचन-नस्य भी कहते हैं। प्रधमन के योग्य रोग अत्यन्तोत्कटदोषेषु विसंज्ञेषु च दीयते॥१७॥ चूर्णं प्रधमनं धीरैस्तद्वि तीक्ष्णतरं यतः। अत्यन्त बढ़े हुये दोषों में और मूर्च्छित रोगियों को चूर्णरूप में ‘प्रधमन-नस्य’ दी जाती है, क्योंकि वह तीक्ष्णतर होती है। गुडादि-नस्य नस्यं स्याद् गुडशुण्ठीभ्यां पिप्पल्या सैन्धवेन च॥१८॥ जलपिष्टेन तेनाक्षिकर्णनासाशिरोगदाः। मन्याहनुगलोद्भूता नश्यन्ति भुजपृष्ठजाः॥१९॥
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