भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 356 में से

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पृष्ठ 285

अष्टमोऽध्यायः] नस्यविधिः 249 प्रतिमर्श-नस्य का मात्रा स्नेह के दो-दो बूँदों की मानी जितना स्नेह नाक में डालने पर थोड़ा-सा मुख में पहुँच जाती है और वह दोनों नथुनों में प्रयुक्त की जाती है। यह जाये उतना स्नेह प्रतिमर्श की एक मात्रा है। इसे पीना नहीं शास्त्रीय निश्चय है। चाहिये, अपितु मुख में आये हुये स्नेह को थूक देना चाहिये। वक्तव्य-मर्श और प्रतिमर्श नस्यों के नामभेद में मात्रा प्रतिमर्श के योग्य रोगी का भेद ही कारण है। क्षीणे तृष्णास्यशोषार्ते बाले वृद्धे च युज्यते ।। 44 ।। प्रतिमर्श की मात्रा प्रतिमर्शेन शाम्यन्ति रोगाश्चैवोर्ध्वजत्रुजाः। स्नेहे ग्रन्थिद्वयं यावन्मग्ना चोद्धता ततः ।। 38 ।। वलीपलितनाशश्च बलमिन्द्रियजं भवेत् ।। 45 ।। तर्जनीयं स्रवेद् बिन्दुं सा मात्रा बिन्दुसंज्ञिता। क्षीण (जिसकी धातुओं का क्षय हो चुका है), तृष्णा एवंविधैर्बिन्दुसंज्ञैरष्टभिः शाण उच्यते ।। 39 ।। तथा मुखशोष से पीड़ित, बालक तथा वृद्ध को प्रतिमर्श का स देयो मर्शनेस्त्ये तु प्रतिमर्शो द्विबिन्दुकः । प्रयोग करना उचित होता है। इससे जत्रु के ऊपरी भाग के रोग स्नेह में दो ग्रन्थि तक तर्जनी (अँगुठे के समीप वाली) शान्त होते हैं, बलियों (झुर्रियों) तथा अकालपलित का नाश अंगुली को डुबा दें और फिर निकाल लें, उससे जो बूँद होकर ज्ञानेन्द्रियों का बल बढ़ता है। गिरती है, उसको 'बिन्दुमात्रा' कहा जाता है। इस प्रकार के पलित में नस्य आठ बिन्दुओं का एक शाण होता है और वह मर्श नामक बिभीतनिम्बगम्भारी शिवा शेलुश्च काकिनी। नस्य में प्रयुक्त होता है। प्रतिमर्श की मात्रा तो दो बिन्दुओं की एकैकतैलनस्येन पलितं नश्यति ध्रुवम् ।। 46 ।। होती ही है। बहेड़ा, नीम, गम्भार, हरड़, लिसोड़ा तथा मकोय-इनमें प्रतिमर्श के काल से किसी एक तेल की नस्य लेने से पलित (अकाल में बाल समयाः प्रतिमर्शस्य बुधैः प्रोक्ताश्चतुर्दश ।। 40 ।। पकना) अवश्य नष्ट हो जाता है। प्रभाते दन्तकाष्ठान्ते गृहान्निर्गमने तथा। नस्य-ग्रहण-विधि व्यायामाध्वव्यवायान्ते विण्मूत्रान्तेऽञ्जने कृते ।। 41 ।। अथ नस्यविधिं वक्ष्ये नस्यग्रहणहेतवे। कवलान्ते भोजनान्ते दिवा सुप्तोत्थिते तथा। देशे वातरजोमुक्ते कृतदन्तनिघर्षणम् ।। 47 ।। वमनान्ते तथा सायं प्रतिमर्शः प्रयुज्यते ।। 42 ।। विशुद्धं धूमपानेन स्विन्नभालगलं तथा। विद्वानों ने प्रतिमर्श-नस्य के 14 समय कहे गये हैं। उत्तानशायिनं किञ्चित् प्रलम्बशिरसं नरम् ।। 48 ।। यथा-1. प्रातःकाल, 2. दतवन करने के पश्चात्, 3. घर से आस्तीर्णहस्तपादं च वस्त्राच्छादितलोचनम्। बाहर जाते समय, 4. व्यायाम के पश्चात्, 5. मार्ग-गमन के समुन्नमितनासाग्रं वैद्यो नस्येन योजयेत् ।। 49 ।। पश्चात्, 6. मैथुन के पश्चात्, 7. मलोत्सर्ग के पश्चात्, 8. कोष्णमच्छिन्नधारं च हेमतारादिशुक्तिभिः। मूत्रोत्सर्ग के पश्चात्, 9. अञ्जन लगाने के पश्चात्, 10. कवल शुक्त्या वा यन्त्र युक्त्या वा प्लोतैर्वा नस्यमाचरेत् ।। 50 ।। (जलपान) के पश्चात्, 11. भोजन के पश्चात्, 12. दिन में नस्येष्वासिच्यमानेषु शिरो नैव प्रकम्पयेत्। सोने के पश्चात्, 13. वमन के पश्चात् और 14. सायंकाल। न कुप्येन प्रभाषेत नोच्छिङ्खेन हसेत् तथा ।। 51 ।। इन समयों में प्रतिमर्श का प्रयोग किया जाता है। एतैर्हि विहितः स्नेहो नैवान्तः सम्प्रपद्यते। वक्तव्य-इसके विशेष विवेचन के लिए देखे-सु० ततः कासप्रतिश्यायशिरोऽक्षिगदसम्भवः ।। 52 ।। चि० अ० 40। शृङ्गाटकमभिप्लाव्य स्थापयेन्न गिलेद् द्रवम्। प्रतिमर्श की विधि इसके पश्चात् नस्य लेने के लिये उसकी विधि कही ईषदूच्छिङ्कनात् स्नेहो यदा वक्त्रं प्रपद्यते। जायेगी। इसके लिए वायु (तीव्र वायु) तथा धूलि से रहित नस्ये निषिक्तं तं विद्यात् प्रतिमर्शं प्रमाणतः ।। 43 ।। स्थान होना चाहिये। रोगी को पहले दतवन तथा धूमपान उच्छिन्दन् पिबेच्चैतन्निष्ठीवेन्मुखमागतम्। कराकर शुद्ध कर लें, उसके मस्तक तथा गले को स्वेदित कर दें, फिर उसे चित लेटा दें और गरदन के नीचे तकिया रखकर CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

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