शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः
[बायाँ स्तम्भ]
आलेप के नाम तथा परिमाण आलेपस्य च नामानि लिप्तो लेपश्च लेपनम्। दोषघ्नो विषहा वर्ण्यो मुखलेपस्त्रिधा मतः ।। 1 ।। त्रिप्रमाणश्चतुर्भागस्त्रिभागोऽर्धाङ्गुलोन्नतः । आर्द्रो व्याधिहरः स स्याच्छुष्को दूषयतिच्छविम् ।। 2 ।। आलेप के तीन नाम हैं-1. लिप्त, 2. लेप तथा 3. लेपन। मुखलेप तीन प्रकार का होता है-1. दोषघ्न (दोषनाशक) 2. विषहा (विषनाशक) और 3. वर्ण्य (वर्ण के लिए हितकारक) और इसकी मोटाई के तीन परिमाण हैं, यथा-1. चौथाई अंगुल, 2. तिहाई अंगुल तथा 3. आधा अंगुल मोटा। वह जब तक आर्द्र या गीला रहता है, तब तक व्याधि को हरता है और जब सूख जाता है, तब छवि अर्थात् कान्ति को दूषित करता है। तात्पर्य यह है कि सूखने से पहले ही लेप को उतार देना चाहिये। वक्तव्य-चिकित्सा में आलेप या लेप भी बहुत महत्त्व की क्रिया है। इससे अनेक प्रकार के रोग शान्त किये जाते हैं। इस अध्याय में लेपों का वर्णन किया जायेगा।
शोथनाशक लेप पुनर्नवां दारु शुण्ठीं सिद्धार्थ शिग्रुमेव च। पिष्ट्वा चैवारनालेन प्रलेपः सर्वशोथजित् ।। 3 ।। पुनर्नवा (गदहपुन्ना), देवदारु, सोंठ, सरसों तथा सहिजन की छाल-इन सबको काँजी में पीसकर लेप करने से सभी प्रकार के शोथ शान्त हो जाते हैं।
दाहनाशक लेप बिभीतफलमज्जाया लेपो दाहार्तिनाशनः। बहेड़ा के फल की मज्जा (गिरी) का लेप दाह तथा पीड़ा को शान्त करता है।
[दायाँ स्तम्भ]
दशाङ्ग लेप शिरीषं मधुपष्टी च तगरं रक्तचन्दनम् ।। 4 ।। एला मांसी निशायुग्मं कुष्ठं बालकमेव च। इति सञ्चूर्ण्य लेपोऽयं पञ्चमांशमृतप्लुतः ।। 5 ।। जलेन क्रियते सुज्ञैर्दशाङ्ग इति संज्ञितः । विसर्पान् विषस्फोटाञ्शोथान् दुष्टव्रणाञ्जयेत् ।। 6 ।। सिरिस की छाल, मुलेठी, तगर, लालचन्दन, बड़ी इलायची, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, कूट एवं नेत्रबाला-इन सबका कपड़छन चूर्ण बनाकर और चूर्ण से पाँचवाँ भाग घी मिलाकर जल के साथ पकाकर लेप लगाना चाहिये। इसका नाम दशाङ्ग लेप है। यह विसर्प (मकड़ी का मूतना), विष-विकार, विस्फोट, शोथ तथा दुष्ट व्रणों को नष्ट करता है। वक्तव्य-इस प्रकार के लेपों को 'पुल्टिस' भी कहते हैं।
भल्लातक-शोथहर लेप अजादुग्धतिलैर्लेपो नवनीतेन संयुतः। शोथमारुष्करं हन्ति लेपो वा कृष्णमृत्तिकैः ।। 7 ।। बकरी का दूध, तिल तथा मक्खन का लेप अथवा कालीमिट्टी (धानों के खेत की) का लेप भिलावा के सूजन को नष्ट करता है। वक्तव्य-भिलावा का रस अथवा उसकी भाप लगने से प्रायः शोथ हो जाता है।
लाङ्गल्यादि लेप लाङ्ग्ल्यतिविषालाबुजालिनीमूलबीजकैः । लेपो धान्याम्बुसम्पिष्टः कटिविस्फोटनाशनः ।। 8 ।। कलिहारी की जड़, अतीस, कड़वी तुम्बी, जालिनी
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