भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 356 में से

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पृष्ठ 297

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एकादशोऽध्यायः] \hspace{6cm} लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः \hspace{6cm} 261


[बायाँ स्तम्भ]

भाग में लेकर भेड़ के मूत्र में पीस लें। इसका लेप करने से बाल काले हो जाते हैं।

\begin{center}पलितनाशक लेप ( 5 )\end{center} त्रिफला लोहचूर्णं च दाड़िमत्वग्बिसं तथा।।31।। प्रत्येकं पञ्चपलिकं चूर्णं कुर्याद् विचक्षणः। भृङ्गराजरसस्यापि प्रस्थषट्कं प्रदापयेत्।।32।। क्षिप़्वा लोहमये पात्रे भूमिमध्ये निधापयेत्। मासमेकं ततः कुर्याच्छागीदुग्धेन लेपनम्।।33।। कूर्चे शिरसि रात्रौ च संवेष्ट्यैरण्डपत्रकैः। स्वपेत् प्रातस्ततः कुर्यात् स्नानं तेन च जायते।।34।। पलितस्य विनाशश्च त्रिभिर्लेपर्न संशयः।

त्रिफला लोहचूर्ण अनार के फलों का छिलका और बिस (कमलनाल) प्रत्येक द्रव्य को पाँच-पाँच पल (20-20 तोला) लेकर चूर्ण बना लें और भाँगरा का रस छः प्रस्थ (4 सेर 3 पाव 4 तोला) निकाल कर और उपर्युक्त चूर्ण मिलाकर लोहपात्र में डालकर इस पात्र को भूमि में गाड़ दें। एक मास के पश्चात् निकाल कर, बकरी का दूध मिलाकर रात्रि में दाढ़ी तथा शिर पर लेप करे और एरण्ड के पत्तों से बाँधकर सो जायें, प्रातःकाल उठकर स्नान करें। इस प्रकार तीन बार लेप करने से 'पलित' का विनाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।

वक्तव्य—युवावस्था में जिनके बाल पक जाते हैं, उनके लिए उक्त लेपों का प्रयोग हितकर होता है।

\begin{center}रोमनाशक लेप ( 1 )\end{center} शङ्खचूर्णस्य भागौ द्वौ हरितालं च भागिकम्।।35।। मनःशिला सार्धभागा स्वर्जिका चैकभागिका। लेपोऽयं वारिपिष्टस्तु केशानुत्पाट्य दीयते।।36।। अनया लेपयुक्त्या च सप्तवेलं प्रयुक्तया। निर्मूलं केशस्थानं स्यात् क्षपणस्य शिरो यथा।।37।।

शंखचूर्ण (भस्म) दो भाग (2 तोला), हरिताल 1 भाग (1 तोला), मैनसिल आधा भाग (आधा तोला) और सज्जीखार 1 भाग (1 तोला)– इन सबको जल में पीसकर और बालों को उखाड़कर लेप किया जाता है। इसी प्रकार सात बार लेप करने से वालों का स्थान निर्मूल (रोमोत्पादन शक्तिहीन) हो जाता है। जैसे–क्षपणक (बौद्ध भिक्षु) का शिर।


[दायाँ स्तम्भ]

\begin{center}रोमनाशक लेप ( 2 )\end{center} तालकं शाणयुग्मं स्यात् षट्शाणं शङ्खचूर्णकम्। द्विशाणिकं पलाशस्य क्षारं दत्त्वा प्रमर्दयेत्।।38।। कदलीदण्डतोयेन रविपत्ररसेन वा। अस्यापि सप्तभिर्लेपै रोम्णां शातनमुत्तमम्।।39।।

हरिताल दो शाण (आधा भर), शंखभस्म छः शाण (डेढ़ भर) और पलास का क्षार तीन शाण (पौन भर) इनको केले के दण्डरस अथवा आक के पत्तों के रस से पीस लें। इसका भी सात बार लेप करने से रोम कट जाते हैं। यह भी उत्तम योग है।

अर्शो-लेप—'स्वर्जिकातुत्थशैलेयमञ्जनं सरसाञ्जनम्। मनःशिलालेपसमं चूर्ण मांसाङ्कुरापहम्।।' अर्थात् सज्जीखार, तूतिया (भुना), छरीला, काला सुरमा, रसवत, मैनशिल और हरताल का चूर्ण करके जल से गोली बना लें, उसके बाद थोड़ा दही के पानी में घिसकर लेप करें तो सभी प्रकार के 'मांसांकुर' (मस्से) नष्ट हो जाते हैं।

शोथनाशक लेप—'नलिका गन्धद्रव्यस्य चूर्णं पयः परिप्लुतम्। पक्वं तल्लेपनाद् हन्ति सर्वान् शोथरुजादिकान्।।' अर्थात् नलिका या नालुका नामक (मोटा तज) गन्ध द्रव्य को पीसकर जल में घोलकर और अग्नि में पकाकर लेप करने से सभी प्रकार के शोथ तथा पीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं।

कर्णमूल शोथ-चिकित्सा—'कुलत्थः कट्फलं शुण्ठी कारवी च समांशकैः। सुखोष्णैर्लेपनं कार्यं कर्णमूले मुहुर्मुहुः।। गैरिकं कठिनं शुण्ठी कट्फलारग्वधैः समैः। उष्णैः काञ्जिकसम्पिष्टैर्लेपनं कर्णमूलनुत्।।' अर्थात् कुलथी, कायफल, सोंठ तथा कालीजीरी समान भाग में लेकर जल में पीसकर और गर्म करके कर्णमूल शोथ पर बार-बार लेप करें तो वह शान्त हो जाता है। गेरू, खड़िया मिट्टी, सोंठ, कट्फल तथा अमलतास की गुदी को समान भाग में लेकर काँजी में पीसकर गर्म लेप करने से 'कर्णमूल शोथ' दूर हो जाता है।

\begin{center}श्वित्रहर लेप ( 1 )\end{center} सुवर्णपुष्पी कासीसं विडङ्गानि मनःशिला। रोचना सैन्धवं चैव लेपनाच्छ्वित्रनाशनम्।।40।।

सत्यानाशी की जड़, कासीस (हीराकासीस), वायविडंग, मैनसिल, गोरोचन तथा सेंधा नमक–इन सबका लेप 'श्वित्र' (सफेद कुष्ठ या फुलबहरी) का नाश करता है।