भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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एकादशोऽध्यायः ] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 263


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वक्तव्य—इसका जितना ही पतला लेप किया जाता है, उतना ही अधिक लाभ होता है।

पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (3)

दूर्वाऽभया सैन्धवं च चक्रमर्दः कुठेरकः। एभिस्तक्रयुतो लेपः कण्डूदद्रूविनाशनः ॥ 54 ॥

सफेद दूध, हरड़, सेंधा नमक, चक्रमर्द, तथा तुलसी–इन सबको तक्र (मट्ठा) के साथ पीसकर लेप करने से खुजली तथा दाद का विनाश हो जाता है।

पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (4)

दूर्वानिशायुतो लेपः कण्डूपामाविनाशनः। कृमिदद्रूहरश्चैव शीतपित्तापहः स्मृतः ॥ 55 ॥

दूध तथा हल्दी का लेप कण्डू (खुजली) तथा पामा का विनाश कर कृमि, दाद तथा शीतपित्त का विनाश करता है।

पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (5)

सिद्धार्थरजनीकुष्ठप्रपुन्नाटतिलैः सह। कटुतैलेन सम्मिश्रं दद्रुघ्नं च प्रलेपनम् ॥ 56 ॥

सरसों, हल्दी, कूठ, चक्रमर्द तथा तिल को पीसकर और कटुतैल (सरसों का तेल) को मिलाकर लेप करने से दाद का विनाश होता है।

वातविसर्पहर लेप

रास्ना नीलोत्पलं दारु चन्दनं मधुकं बला। घृतक्षीरयुतो लेपो वातवीसर्पनाशनः ॥ 57 ॥

रास्ना, नीलकमल, देवदारु, लालचन्दन, मुलेठी तथा बरियारा–इनको पीसकर घी तथा दूध के साथ मिलाकर लेप करने से वातजनित वीसर्प का नाश होता है।

पित्तविसर्पहर लेप

मृणालं चन्दनं लोध्रमुशीरं कमलोत्पलम्। सारिवामलकी पथ्या लेपः पित्तविसर्पनुत् ॥ 58 ॥

कमलनाल, लालचन्दन, लोध, खस, लालकमल, नीलकमल, सारिवा, आँवला तथा हरड़ का लेप पित्तजनित विसर्प को नष्ट करता है।

कफविसर्पहर लेप

त्रिफला पद्मकोशीरं समङ्गा करवीरकम्। नलमूलमनन्ता च लेपः श्लेष्मविसर्पहा ॥ 59 ॥

त्रिफला, पद्माकाष्ठ, खस, मजीठ, कनेर के पत्र र्पनरसल की जड़ तथा अनन्तमूल का लेप कफजनित वीसर्प को नष्ट करता है।


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वातरक्त, रक्तपित्तहर लेप

मांसी सर्जरसो लोध्रं मधुकं सहरेणुकम्। मूर्वा नीलोत्पलं पद्मं शिरीषकुसुमैः सह ॥ 60 ॥ प्रलेपः पित्तवातास्त्रे शतधौतघृतप्लुतः। आमलं घृतभृष्टं तु पिष्टं काञ्जिकवारिभिः ॥ 61 ॥ जयेन्मूर्ध्नि प्रलेपेन रक्तं नासिकया स्रुतम्।

जटामांसी, राल, लोध, मुलेठी, सम्भालू के बीज, मरोड़फली, नीलकमल, लालकमल तथा सिरस के फूल–इन सबको पीसकर तथा सौ बार धोये हुये घृत में मिलाकर वातरक्त में लेप किया जाता है। आँवले को घृत में थोड़ा भूनकर तथा काँजी के जल में पीसकर मस्तक पर लेप करने से नाक से गिरने वाला रक्त (नकसीर) बन्द हो जाता है।

वातिक शिरोरोगहर लेप (1)

कुष्ठमेरण्डतैलेन लेपात् काञ्जिकपेषितम् ॥ 62 ॥ शिरोऽर्तिं वातजां हन्यात् पुष्पं वा मुचुकुन्दजम्।

कूठ को काँजी में पीसकर और एरण्ड के तैल में पकाकर लेप करें अथवा मुचुकुन्द के फूलों का उक्त विधि से लेप करें। ये लेप वातजनित शिरोरोग को नष्ट करते हैं।

वातिक शिरोरोगहर लेप (2)

देवदारु नतं कुष्ठं नलदं विश्वभेषजम् ॥ 63 ॥ सकाञ्जिकः स्नेहयुक्तो लेपो वातशिरोऽर्तिनुत्।

देवदारु, तगर, कूठ, खस तथा सोंठ को काँजी में पीसकर और स्नेह (एरण्ड तैल) में काकर लेप करें। यह भी वातजनित शिरोरोग को नष्ट करता है।

पैत्तिक शिरोरोगहर लेप (1)

चन्दनोशीरयष्ट्याह्वबलाव्याघ्रनखोत्पलैः ॥ 64 ॥ क्षीरपिष्टैः प्रलेपः स्याद् रक्तपित्तशिरोऽर्तिजित्।

सफेद चन्दन, खस, मुलेठी, बरियारा, नाखूना तथा कमल को दूध में पीसकर लेप करें। यह रक्तजनित तथा पित्तजनित शिरोरोग को जीतता है।

पैत्तिक शिरोरोगहर लेप (2)

धात्रीकसेरुहीबेरपद्मपद्मकचन्दनैः ॥ 65 ॥ दूर्वोशीरनलानां च मूलैः कुर्यात् प्रलेपनम्। शिरोऽर्तिं पित्तजां हन्याद् रक्तपित्तरुजं तथा ॥ 66 ॥

आँवला, कसेरू, नेत्रवाला, कमल, पद्मकाष्ठ, श्वेतचन्दन, दूब, खस् तथा नरसल की जड़–इन सबको पीसकर लेप