भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 265 सिंगी द्वारा रक्त निकालना) कर्म करें, यदि इससे भी लाभ न पाचन लेप हो तो तीसरा क्रिया उपनाह (पकाने का प्रयत्न) या पुल्टिस शणमूलकशिग्रूणां फलानि तिलसर्षपाः। का प्रयोग करें, यदि न पके तो चौथी पाटन क्रिया (चोरा सवचः किण्वमतसी प्रदेहः पाचनः स्मृतः॥84॥ लगाना) करें, पाँचवीं शोधन-क्रिया (जिससे दोष पूर्ण रूप शण (सनई), मूली, सहजन के बीज, तिल, सरसों, से निकल जाते हैं) करें छठी रोपण-क्रिया (व्रण को भरने वच, खली या अलसी (तीसी) को पीसकर और पकाकर का उपाय) करें और सातवीं सवर्णकरण-क्रिया (व्रणस्थान उसका प्रदेह (मोटा लेप या पुल्टिस) करने से व्रणदोष का पर सफेद दाग या काला दाग न पड़ जाये) करें। इस प्रकार पाचन होता है। फोड़ो में सात क्रम (चिकित्सा-विधियाँ कही गयी) हैं। दारण लेप (1) वक्तव्य-देखें-सु०सू०अ० 17। दन्ती चित्रकमूलत्वक्स्नुह्यर्कपयसी गुडः। वातिक व्रणशोथहर लेप भल्लातकास्थि कासीसं सैन्धवं दारणः स्मृतः॥85॥ बीजपूरजटा हिंस्रा देवदारु महौषधम् ॥ 79 ।। दन्ती, चीते के मूल का छाल, सेहुण्ड तथा आक का रास्नाग्निमन्थो लेपोऽयं वातशोथविनाशनः। दूध, गुड़, भिलावा, लाल कासीस तथा सेंधा नमक का लेप बिजौरा नींबू की जड़, हींस की जड़, देवदारु, सोंठ, दारण (व्रण को फोड़ने वाला) होता है। रास्ना तथा अरणी की छाल इनका लेप वातजनित शोथ को दारण लेप (2) नष्ट करता है। चिरबिल्वोऽग्निको दन्ती चित्रको हयमारकः। पैत्तिक व्रणशोथहर लेप कपोतकङ्कगृध्राणां मलं लेपेन दारणम्॥86॥ मधुकं चन्दनं मूर्वा नलमूलं च पद्मकम्॥80॥ करञ्ज (डिठोरा) के बीज, भिलावा, दन्ती, चीता, कनेर उशीरं बालकं पद्मं पित्तशोथे प्रलेपनम्। कबूतर कंक (चील) तथा गिद्ध की बीट, इनका लेप भी मुलेठी, लालचन्दन, मरोड़फली, नरसल का जड़, दारण होता है। पदमकाठ, खस, नेत्रबाला तथा कमल का लेप पित्तजनित दारण लेप (3) शोथ में करना चाहिये। स्वर्जिकायावशूकाद्याः क्षारा लेपेन दारणाः। श्लैष्मिक व्रणशोथहर लेप हेमक्षीर्यास्तथा लेपो व्रणे परमदारणः॥87॥ कृष्णा पुराणपिण्याकं शिग्रुत्वक्सिकता शिवा ।। 81 ।। सज्जीखार एवं जौखार आदि क्षार अत्यन्त दारण होते हैं मूत्रपिष्टः सुखोष्णोऽयं प्रदेहः श्लेष्मशोथहा। और सत्यानाशी के पञ्चाङ्ग का लेप तो परम दारण (फोड़ों को पीपल, पुरानी खली, सहजन का छाल, बालू (रेत) फोड़ने वाला) होता है। तथा हरड़-इन सबको गोमूत्र में पीसकर और गर्म करके मोटा वक्तव्य-दारण-लेप पके हुये फोड़ों पर किये जाते हैं। लेप करने से कफजनित शोथ का नाश हो जाता है। इनसे फोड़े फूट जाते हैं। विद्रधि जाति के अर्थात् गम्भीर फोड़े रक्तज व्रणशोथहर लेप नहीं फूटते, उनमें चीरा लगाना ही पड़ता है। दोनों का लक्ष्य द्वे निशे चन्दने द्वे च शिवा दूर्वा पुनर्नवा ।। 82 ।। एक ही पाटन या फाड़ना है। रक्तसेचन-क्रम का वर्णन अगले उशीरं पद्मकं लोध्रं गैरिकं च रसाञ्जनम्। अध्याय में देखें। आगन्तुके रक्तजे च शोथे कुर्यात् प्रलेपनम् ।। 83 ।। शोधन-लेप हल्दी, दारुहल्दी, लालचन्दन, सफेदचन्दन, हरड़, दूब, तिलरौन्धवयष्ट्याह्वनिम्बपत्रनिशायुगैः । पुनर्नवा, खस, पद्मकाठ, लोध, गेरू और रसवंत का लेप त्रिवृद्घृतयुतैः पिष्टैः प्रलेपो व्रणशोधनः ।। 88 ।। आगन्तुज (चोट आदि से उत्पन्न होने वाले) शोथ में तथा तिल, सेंधा नमक, मुलेठी, नीम के पत्ते, हल्दी, दारुहल्दी रक्तजनित शोथ में करना चाहिये। तथा निसोत को पीसकर और घी मिलाकर लेप करने से व्रण वक्तव्य-उक्त लेप तब किये जाते हैं, जब फोड़ा उत्पन्न का शोधन हो जाता है। हो रहा हो। इन्हीं लेपों का एक नाम 'शोथहर' है। वक्तव्य-उक्त लेप से पूर्ण रूप में पूय निकल कर व्रण