शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 356 में से
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एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 267 लेप से गण्डमाला, अर्बुद (रसौली) तथा गलगण्ड शान्त हो जाता है। अपबाहुक आदि के लेप तक्षयित्वा क्षुरेणाङ्गं केवलानिलपीडितम्। तत्र प्रदेशे दद्याच्च पिष्टं गुञ्जाफलैः कृतम्।। 101।। तेनापबाहुजा पीडा विश्वाची गृध्रसी तथा। अन्यापि वातजा पीडा प्रशमं याति वेगतः ।। 102 ।। केवल वायु से पीड़ित अवयव पर क्षुर (छुरा या उस्तरा) से पछ् लगाकर घुंघची को पीसकर लेप करें। इससे अपबाहुक, विश्वाची, गृध्रसी तथा अन्यान्य वातरोग शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। श्लीपदहर लेप धत्तूरैरण्डनिर्गुण्डीवर्षाभूशिगुसर्षपैः । प्रलेपः श्लीपदं हन्ति चिरोत्थमपि दारुणम्।। 103 ।। धतूरा के पत्ते, सम्भालू, पुनर्नवा, सहजन एवं सरसों का लेप पुराने तथा भीषण श्लीपद (फीलपाँव) को नष्ट करता है। अण्डवृद्धिहर लेप अजाजीहपुषाकुष्ठमैरण्डबदरान्वितम् । काञ्जिकेन तु सम्पिष्टं कुरण्डघ्नं प्रलेपनम् ।। 104 ।। काला जीरा, हाऊबेर, कूठ, एरण्ड की जड़ तथा बेर को काँजी में पीसकर लेप करने से 'कुरण्ड' (अण्डवृद्धि) का नाश होता है। उपदंशहर लेप (1) करवीरस्य मूलेन परिपिष्टेन वारिणा। असाध्यापि व्रजत्यस्तं लिङ्गोत्था रुक्प्रलेपनात् ।। 105 ।। कनेर की जड़ को जल में पीसकर लेप करने से लिंग में होने वाले असाध्य रोग (उपदंश के व्रण) नष्ट हो जाते हैं। उपदंशहर लेप (2) दहेत्कटाहे त्रिफलां सा मषी मधुसंयुता। उपदंशे प्रलेपोऽयं सद्यो रोपयति व्रणम् ।। 106 ।। त्रिफला को कड़ाही में डालकर (जलते हुये चूल्हे में रखकर) जला दें। यह मषी (त्रिफला का काली भस्म) मधु के साथ मिलाकर लेप करने से उपदंश के व्रणों को शीघ्र ही भर देती है। उपदंशहर लेप (3) रसाञ्जनं शिरीषेण पथ्यया च समन्वितम्। सक्षौद्रं लेपनं योज्यमुपदंशगदापहम्।। 107।। रसवत्, शिरीष की छाल तथा हरड़ को पीसकर, मधु के साथ मिलाकर लेप करना चाहिये। इससे उपदंशरोग का नाश हो जाता है। अग्निदग्धहर लेप (1) अग्निदग्धे तुगाक्षीरीप्लक्षचन्दनगैरिकैः। सामृतैः सर्पिषा स्निग्धैरालेपं कारयेद् भिषक् ।। 108 ।। तिन्दुकीत्वक्कषायैर्वा घृतमिश्रैः प्रलेपयेत्। वंशलोचन, पिलखन की छाल, सफेदचन्दन, गेरू तथा गिलोय को पीसकर घी में मिलाकर अथवा तिन्दुक की छाल के स्वाथ को घी में फेंट कर आग से जले पर लेप करना चाहिये। अग्निदग्धहर लेप (2) यवान् दग्ध्वा मषी कार्या तैलेन युतया तया ।। 109 ।। दद्यात् सर्वाग्निदग्धेषु प्रलेपो व्रणरोपणः। जौ को जलाकर राख बना लें, फिर इसे तेल में मिलाकर सभी प्रकार के अग्निदग्ध पर लेप करने से घाव भर जाते हैं। भगसंकोचक लेप पलाशोदुम्बरफलैस्तिलतैलसमन्वितैः ।। 110 ।। मधुना योनिमालिम्पेद् गाढीकरणमुत्तमम्। पलाश के फल तथा गूलर के फल दोनों को पीसकर, मधु के साथ मिलाकर भग में लेप करें, इससे वह संकुचित हो जाती है। माकन्दफलसंयुक्तमधुकर्पूरलेपनात् ।। 111 ।। गतेऽपि यौवने स्त्रीणां योनिर्गाढाऽतिजायते। आम की गुठली का चूर्ण, मधु तथा कपूर के साथ मिलाकर लेप करने से यौवन के ढल जाने पर भी स्त्रियों का भग अत्यन्त गाढ़ा (संकुचित) हो जाता है। वक्तव्य-उक्त लेपों का प्रयोग भग के भीतर नहीं किया जा सकता। अतः उक्त द्रव्यों की ढीली पोटली बनाकर भग के भीतर रखनी चाहिये। लिङ्गवृद्धिकर लेप (1) मरिचं सैन्धवं कृष्णा तगरं बृहतीफलम् ।। 112 ।। अपामार्गस्तिलाः कुष्ठं यवा माषाश्च सर्षपाः । अश्वगन्धा च तच्चूर्णं मधुना सह योजयेत् ।। 113 ।। अस्य सन्ततलेपेन मर्दनाच्च प्रजायते। लिङ्गं स्तनोत्सेधः संहतिर्भुजकर्णयोः ।। 114 ।।