भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ] परिभाषा 9 का व्यवहार अधिक लोग करते हैं, उसे श्रेष्ठ कहा गया है। यहाँ श्रेष्ठ का तात्पर्य उत्तम अर्थवाचक कदापि नहीं है। प्राचीनकाल में मान-भेद वैजयन्ती-कोषकार ने प्रयोग-भेद से तथा द्रव्य-भेद से समस्त प्रकार के मानभेदों को इस प्रकार तीन भागों में विभक्त किया है-'पाय्यं हस्तादिभिर्मानं, द्रुवयं कुडवादिभिः। पौतवं तुलया प्रोक्तम्' । -वै० कोष।

  1. पौतवमान-तुला (तराजू) द्वारा पदार्थों के भार का जो मान लिया जाता है, उसे पौतवमान (Measures of weight) कहते हैं।
  2. द्रुवयमान-विभिन्न प्रकार के द्रव पदार्थों के आयतन को जिससे नापा या तौला जाता है उसे द्रुवयमान (Meas- ures of capacity) कहते हैं।
  3. पाय्यमान-वस्त्र आदि लम्बाई, ऊँचाई, नीचाई, वाले पदार्थों को जो हाथ आदि नापों द्वारा नापा जाता है, उसे पाय्यमान (Measures of length) कहते हैं। कतिपय प्राचीन पौतवमान

(1) विष्णूक्त पौतवमान 8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा 3 लिक्षा = 1 राजिका 3 राजिका = 1 श्वेतसर्षप 6 श्वेतसर्षप = 1 यव 3 यव = 1 गुञ्जा 5 गुञ्जा = 1 माषक 12 माषक = 1 अक्षार्ध 16 माषक = 1 सुवर्ण 2 गुञ्जा = 1 रौप्यमाषक 16 रौप्यमाषक = 1 धरण 16 माषक = 1 ताम्रिक कर्ष

(2) मनूक्त पौतवमान 8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा 3 लिक्षा = 1 राजसर्षप 3 राजसर्षप = 1 श्वेतसर्षप 6 श्वेतसर्षप = 1 यवमध्यम 3 मध्यमयव = 1 गुञ्जाकृष्णल 5 कृष्णलगुञ्जा = 1 माषक

16 माषक = 1 सुवर्ण 4 सुवर्ण = 1 पल 10 पल = 1 धरण 2 कृष्णल = 1 रौप्यमाषक 16 रौप्यमाषक = 1 रौप्यधरण 16 माषक = 1 कार्षापण 10 रौप्यधरण = 1 शतमान (रजत) 4 सुवर्ण = 1 निष्क (रजत)

(3) याज्ञवल्क्योक्त पौतवमान 8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा 3 लिक्षा = 1 राजसर्षप 3 राजसर्षप = 1 श्वेतसर्षप 6 श्वेतसर्षप = 1 यवमध्यम 3 मध्यमयव = 1 कृष्णल (रत्ती) 5 कृष्णल = 1 माषक 16 माषक = 1 सुवर्ण 4-5 सुवर्ण = 1 पल 2 कृष्णल = 1 रौप्यमाषक 16 रौप्यमाषक = 1 धरण 10 धरण = 1 शतमान (रजत) 4 सुवर्ण = 1 निष्क (पल)

(4) सुश्रुतोक्त पौतवमान 12 मध्यमधान्य = 1 सुवर्णमाषक माष 16 सुवर्णमाषक = 1 सुवर्ण 19 निष्पावमध्यम = 1 धरण 2½ धरण = 1 कर्ष 4 कर्ष = 1 पल 4 पल = 1 कुडव 4 कुडव = 1 प्रस्थ 4 प्रस्थ = 1 आढक 4 आढक = 1 द्रोण 100 पल = 1 तुला 20 तुला = 1 भार

(5) कौटिल्योक्त पौतवमान 16 धान्यमाष = 1 सुवर्णमाषक