भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ] परिभा॒षा 15 वक्तव्य-प्लोत शब्द से थैला, बोरा या कपड़े की गठरी का, मृद्भाण्ड शब्द से चीनी मिट्टी के मर्तबान, बोयाम, काँच या शीशा के जार, बरनी, शीशी, बोतल आदि का, फलक शब्द से लकड़ी की टाँड, आलमारी, बक्सा आदि का तथा न्यङ्कु शब्द से खूँटी, छत पर लटका हुआ कुंडा आदि का ग्रहण करना चाहिये। इन्हीं में औषधद्रव्यों को भरकर, सँभालकर लटकाकर यथायोग्य रखें, क्योंकि यह भेषजागार है। इसमें सभी आवश्यक औषधद्रव्यों आदि का संग्रह करके रखा जाता है। देखें-सु० सू० अ० 38.81। भेषज-भण्डार-स्वरूप (धूमवर्षानिलक्लेदैः सर्वर्तुष्वनभिद्रुते ।। 59 ।। ग्राहयित्वा गृहे न्यस्येद् विधिनौषधसङ्ग्रहम्।) जिस घर में धुआँ, वर्षा, अनिल (दूषित वायु) तथा क्लेद (गीलापन) का अहितकर प्रभाव औषधद्रव्यों पर न पड़ सके, उस घर में विधिपूर्वक संग्रह किये गये उन औषधद्रव्यों को रखना चाहिये। वक्तव्य-संग्रह करके रखी हुई प्रत्येक वस्तु की समय-समय पर देख-रेख भी करते रहना चाहिये, नहीं तो वे काम में लाने योग्य नहीं रह जातीं। इनमें उपयुक्त धुआँ आदि को प्रधान कारण माना गया है। वर्षानिल-इस पद का टीकाकारों ने भिन्न-भिन्न अर्थ किया है-वर्षा के कारण औषधद्रव्य सड़ जाते हैं, वर्षानिल = बरसाती हवा के कारण उनमें बुकनी या फफूंदी लग जाती है, अथवा अनिल = दूषित वायु के कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है। इस प्रकार ये सभी अर्थ प्रकरणोचित हैं। विशेष-यह पाठ सुश्रुतसंहिता से लिया गया है। देखें-सु० सू० अ० 38.81। उचित-अनुचित द्रव्य व्याधेरयुक्तं यद् द्रव्यं गणोक्तमपि तत् त्यजेत् ।। 60 ।। अनुक्तमपि यद् युक्तं योजयेत् तत्र तद् बुधः। बुद्धिमान् चिकित्सक का प्रमुख कर्तव्य है कि वह गण में कहे गये भी उस द्रव्य का ग्रहण न करे, जो द्रव्य रोगी के रोग का शमन करने में उपयुक्त न हो और जो द्रव्य उस गण में नहीं कहा गया हो, किन्तु रोग-शमन में उपयोगी हो तो भी उस द्रव्य का ग्रहण कर लेना चाहिये। वक्तव्य-आयुर्वेदीय संहिताओं में अनेक प्रकार के औषधद्रव्यों के गणों का उल्लेख मिलता है, जिनका संग्रह सामान्य दृष्टि से किया गया था, किन्तु यहाँ उक्त निर्देश विशेष परिस्थिति के लिए किया गया है। अतः शास्त्रोक्त क्वाथ, चूर्ण, आसव, अरिष्ट, तथा अवलेह आदि के योगों में कहे गये उस-उस अनुपयोगी द्रव्य या द्रव्यों को निकालकर उपयोगी द्रव्यों को मिला लेने की अनुमति ग्रन्थकार चिकित्सक को दे रहा है। स्थानभेद से औषधद्रव्यों का विचार आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिर्मतः ।। 61 ।। अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः । अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च ।। 62 ।। गृह्णीयात् तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे। आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि ।। 63 ।। विन्ध्याचल, सह्याद्रि आदि पर्वत श्रेणियाँ आग्नेय (अग्निगुण-प्रधान) अर्थात् उष्ण प्रभाव वाली होती हैं और हिमगिरि (हिमालय) सौम्य (सोमगुण युक्त) होता है, अर्थात् शीत प्रभाव वाला होता है। इसलिये उक्त प्रकार की पर्वत श्रेणियों में पैदा होने वाली औषधियाँ अपने-अपने स्थान में उत्पन्न होने के कारण से तदनुरूप गुणों वाली होती हैं। अर्थात् विन्ध्य आदि पर्वत श्रेणियों में पैदा होने वाली उष्णगुण-प्रधान तथा हिमालय परिसर में पैदा होने वाली शीतगुण-प्रधान औषधियाँ होती हैं। इसके अतिरिक्त स्थानों (समतल प्रदेशों) में, वनों तथा उपवनों (बगीचों) में भी औषधियाँ उगती या उगायी जाती हैं। उक्त सभी प्रकार की औषधियों को चिकित्सक प्रसन्नचित्त होकर, मनसा, वाचा पवित्र होकर, प्रातःकाल, शुभवार (दिन) में, सूर्य की ओर मुख करके मौन धारण कर तथा हृदय में शिव जी को प्रणाम कर ग्रहण करे। वक्तव्य-विन्ध्याचल आदि पर्वत आग्नेय और हिमालय सौम्यगुण-प्रधान है। उक्त स्थानों पर होने वाली औषधियाँ तदनुरूप होती हैं, ऐसा जो कहा गया है, वह सामान्य वचन है। उदाहरणस्वरूप आप 'वत्सनाभ' विष का परिचय देखें। यह हिमालयप्रदेश में 10 से 14 हजार फुट की ऊँचाई पर पैदा होता है। यह हिमालय के अनुरूप न होकर उष्णवीर्य होता है। ऐसी विशेषताएँ सामान्य वचनों के बीच में सर्वत्र मिलती ही हैं। वनेषूपवनेषु च-'वनेषु' प्राकृतिक वनों में, जहाँ वृक्ष, लता, गुल्म आदि स्वयं पैदा हो जाते हैं। उपवनेषु-ये वे बगीचे हैं जिन्हें 'भैषज्योद्यान' कहा जाता है। इस प्रकार के